कोरिया छत्तीसगढ़। राधेकृष्ण के पावन स्मरण के साथ आध्यात्मिक जीवन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए संतजनों ने कहा कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवत्प्राप्ति है। वे ही प्राणी, पदार्थ और परिस्थितियाँ हमारे लिए हितकारी हैं, जिनसे हमें भगवान की प्राप्ति के साधन में उत्साह, शक्ति, सहयोग और प्रकाश प्राप्त हो। जिनके संपर्क से ईश्वर-स्मरण दृढ़ हो, वही सत्संग है। इसके अतिरिक्त जो भी हमें भक्ति मार्ग से दूर ले जाए, वह कुसंग है और त्याज्य है। इसलिए सावधानीपूर्वक जीवन को भगवान में लगाकर रखना ही सच्ची मानवता और वास्तविक विकास है।
वक्ता ने कहा कि मनुष्य को संसार में उतना ही संपर्क रखना चाहिए, जितना जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक हो। सेवा, नौकरी या पारिवारिक दायित्वों के अतिरिक्त एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। शेष समय भगवान के चिंतन, उनकी कृपा और प्रेम के स्मरण में लगाना चाहिए। यदि मन थक जाए तो नाम-जप करना चाहिए अथवा भगवान की कथा सुननी या पढ़नी चाहिए। इससे श्रद्धा दृढ़ होती है और ज्ञान नित्य नवीन बना रहता है। ज्ञान का विस्मरण ही जीव को उसके लक्ष्य से दूर कर देता है। जब विवेक नष्ट होता है, तब साधना भी संभव नहीं रह जाती।
मानव देह को अत्यंत दुर्लभ बताते हुए कहा गया कि इसका उद्देश्य केवल भोग-विलास नहीं, बल्कि भगवद् सेवा की भावना को बढ़ाना है। मृत्यु को सदा सामने मानकर जीवन जीना चाहिए। प्रत्येक प्रातः यह स्मरण होना चाहिए कि समय सीमित है और प्रत्येक नया दिन हमें साधना के लिए प्रेरित कर रहा है। “आज का दिन भी बीत गया” — यह भाव जागृत रहे तो आलस्य और प्रमाद दूर होते हैं। जीवन का प्रत्येक सबेरा मानो आदेश देता है कि शीघ्रता करो, समय अल्प है।
दिनभर कर्मयोग की भावना से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए रात को सोने से पहले आत्मचिंतन आवश्यक है। दो मिनट शांत होकर यह विचार करना चाहिए कि आज हमने कौन-कौन सी भूलें कीं—क्या हमने क्रोध किया, लोभ किया, काम या अहंकार से प्रभावित हुए? इन दोषों को स्वीकार कर हृदय से पश्चाताप करना चाहिए और अगले दिन के लिए संकल्प लेना चाहिए कि अब कोई अपराध नहीं करेंगे और सदा भगवान को अपने साथ अनुभव करेंगे।
इस नियमित अभ्यास से धीरे-धीरे जीव का आंतरिक उत्थान होता है। ईश्वर भक्ति और गुरु भक्ति दृढ़ होती जाती है, संसार से वैराग्य उत्पन्न होता है और मन में शांति का वास होता है। अंततः ऐसा साधक जीवन के वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर कृतार्थ हो जाता है।
आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का यह संदेश केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा है। सत्संग, नाम-स्मरण, आत्मचिंतन और कर्मयोग—इन चार आधारों पर ही मानव जीवन की सफलता टिकी है। यही सच्ची प्रगति है, यही आत्मकल्याण का मार्ग है।

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