बाल मधुमेह पर महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का विशेष प्रशिक्षण आयोजित


सारंगढ़ छत्तीसगढ़ : जिला स्वास्थ्य विभाग, सारंगढ़-बिलाईगढ़ द्वारा यूनिसेफ एवं एकम फाउंडेशन के सहयोग से सारंगढ़ में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए टाइप-1 डायबिटीज (बाल मधुमेह) विषय पर विशेष प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में विभिन्न स्वास्थ्य सुविधाओं से 67 महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एएनएम) सहित कुल 80 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम में जिला कार्यक्रम प्रबंधक (DPM) श्री दीपक कुमार धारा, जिला नोडल अधिकारी (एनसीडी) डॉ. रूपेन्द्र कुमार पटेल , डीईओ श्री शेखर साहू, जिला प्रबंधक (प्रशिक्षण/मानव संसाधन) श्रीमती ममता जोल्हे, जिला लेखा प्रबंधक श्री मनोज कुमार साहू, ब्लॉक कार्यक्रम प्रबंधक श्री नंदलाल इजारदार तथा एकम फाउंडेशन के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं एवं एएनएम की क्षमता को सुदृढ़ करना था, ताकि वे बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज की समय पर पहचान, उचित परामर्श, शीघ्र रेफरल तथा प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित कर सकें।

प्रशिक्षण के दौरान बाल मधुमेह के प्रमुख लक्षणों-अत्यधिक प्यास लगना, अधिक भूख लगना, बार-बार पेशाब आना या बिस्तर गीला करना, तेजी से वजन घटना, अत्यधिक कमजोरी और थकान-की पहचान पर विशेष जोर दिया गया। प्रतिभागियों को बताया गया कि बच्चों में ऐसे लक्षण दिखाई देने पर उन्हें तत्काल निकटतम स्वास्थ्य केंद्र ले जाकर रक्त शर्करा की जांच करानी चाहिए।

प्रशिक्षण में टाइप-1 डायबिटीज की गंभीर एवं आपातकालीन स्थिति डायबिटिक कीटोएसिडोसिस (DKA) की शीघ्र पहचान के बारे में भी विस्तृत जानकारी दी गई। प्रतिभागियों को बताया गया कि तेज या गहरी सांस चलना, उल्टी, पेट दर्द, अत्यधिक कमजोरी, निर्जलीकरण, सांस से फल जैसी गंध आना अथवा बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई देने पर बच्चे को तत्काल अस्पताल में भर्ती कर उपचार प्रारंभ किया जाना आवश्यक है। साथ ही, बार-बार संक्रमण होने वाले बच्चों में मधुमेह की जांच कराने के महत्व पर भी चर्चा की गई।

प्रतिभागियों को समाज में प्रचलित भ्रांतियों के प्रति जागरूक किया गया, जैसे कि बच्चों को मधुमेह नहीं हो सकता या झाड़-फूंक एवं घरेलू उपचार से यह बीमारी ठीक हो सकती है। प्रशिक्षण में स्पष्ट किया गया कि टाइप-1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है। परिणामस्वरूप शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता और प्रभावित बच्चों को नियमित एवं जीवनभर इंसुलिन उपचार की आवश्यकता होती है।

विशेषज्ञों ने बताया कि समय पर पहचान, नियमित इंसुलिन, संतुलित आहार, रक्त शर्करा की निगरानी और निरंतर फॉलो-अप के माध्यम से टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चे स्वस्थ, सक्रिय एवं सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

कार्यक्रम के आयोजन में यूनिसेफ की ओर से डॉ. गजेंद्र सिंह स्वास्थ्य विशेषज्ञ के नेतृत्व में महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग प्रदान किया गया। विशेषज्ञों ने महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में बाल मधुमेह के प्रति समुदाय, अभिभावकों एवं परिवारों को जागरूक करें। साथ ही संभावित मामलों की शीघ्र पहचान कर बच्चों की रक्त शर्करा जांच, समय पर उपचार तथा उचित स्वास्थ्य संस्थान में रेफरल सुनिश्चित करें।

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