नीरज गुप्ता की विशेष रिपोर्ट
कोरिया चरचा कालरी .......नगर पालिका शिवपुर-चरचा में नगरीय निकाय चुनाव दिसंबर माह में होने की संभावनाओं के बीच राजनीतिक हलचल धीरे-धीरे तेज होने लगी है। साथ ही नगरीय चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी हैअक्टूबर से आदर्श आचार संहिता लागू होने की संभावना को देखते हुए अब चुनावी तैयारियों के लिए तीन महीने से भी कम समय शेष माना जा रहा है। बावजूद इसके नगर पालिका क्षेत्र के धरातल पर अभी तक चुनावी गतिविधियां लगभग मृतप्राय नजर आ रही हैं। और नगर पालिका शिवपुर चर्चा की चुनावी राजनीति फिलहाल एक अजब सी खामोशी ओढ़ी हुई है
हालांकि अध्यक्ष पद पहले ही सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित हो चुका है। ऐसे में अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल होने की इच्छुक कुछ महिला दावेदार जन्मदिन समारोह, भंडारा, सामाजिक आयोजनों और जनसंपर्क के माध्यम से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटी हैं। लेकिन असली राजनीतिक तस्वीर नगर पालिका के 15 वार्डों के आरक्षण की घोषणा के बाद ही साफ होगी।
नगर पालिका शिवपुर-चरचा के वार्डों का आरक्षण अभी तक नहीं होने से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे अनेक संभावित प्रत्याशी असमंजस में हैं। किसी को यह चिंता है कि उसका वार्ड सामान्य रहेगा या ओबीसी के खाते में जाएगा, तो किसी की नजर एससी, एसटी अथवा महिला आरक्षण पर टिकी हुई है।यही कारण है कि संभावित प्रत्याशी खुलकर मैदान में उतरने से पहले आरक्षण की सूची का इंतजार कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आरक्षण सूची जारी होते ही शिवपुर-चरचा की राजनीतिक तस्वीर अचानक बदल सकती है और कई चेहरे रातोंरात सक्रिय हो सकते हैं।
पहले समय रहते वार्ड आरक्षण होने के कारण संभावित प्रत्याशियों को अपने क्षेत्र में जनसंपर्क का पर्याप्त अवसर मिल जाता था। वार्ड की स्थिति स्पष्ट होते ही मतदाताओं के बीच प्रत्याशियों की आवाजाही बढ़ जाती थी। लेकिन इस बार आरक्षण में देरी ने दावेदारों की रणनीति को ही रोक दिया है।शिवपुर-चरचा की राजनीति में एक पुरानी चुनावी परंपरा पर भी चर्चा शुरू हो गई है। चुनाव आते ही मतदाता राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। घर-घर दस्तक, हाथ जोड़कर अभिवादन, चाय-नाश्ते से लेकर सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी—हर माध्यम से मतदाताओं को साधने की कोशिश होती है।
लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद यही मतदाता कई बार अपनी समस्याओं को लेकर जनप्रतिनिधियों के दरवाजे तक पहुंचने के लिए संघर्ष करता नजर आता है। स्थानीय लोगों के बीच यह धारणा भी चर्चा में रहती है कि चुनाव के समय मतदाता 'भगवान' होता है और चुनाव खत्म होने के बाद उसकी पूछ-परख कम हो जाती है।
वार्ड आरक्षण को लेकर यह बन रहा संभावित गणित......विगत चार चुनावों के आरक्षण रोस्टर के आधार पर स्थानीय स्तर पर वार्डों के आगामी आरक्षण को लेकर एक संभावित राजनीतिक आकलन सामने आ रहा है। हालांकि यह केवल विश्लेषण है और अंतिम स्थिति जिला निर्वाचन कार्यालय द्वारा जारी आधिकारिक आरक्षण सूची के बाद ही स्पष्ट होगी।
| वार्ड | वार्ड का नाम | संभावित आरक्षण |
वार्ड क्रमांक 1 डॉ. भीमराव आंबेडकर वार्ड ......... S.C.अनुसूचित जाति महिला
वार्ड क्रमांक 2 महाराणा प्रताप वार्ड ... . सामान्य महिला
वार्ड क्रमांक 3 स्वामी विवेकानंद वार्ड ..... सामान्य मुक्त
वार्ड क्रमांक 4 सुभाष चंद्र बोस वार्ड ....S.T.अनुसूचित जनजाति मुक्त |
वार्ड क्रमांक 5 ....शहीद भगत सिंह वार्ड ......सामान्य मुक्त
वार्ड क्रमांक 6 .......लाल बहादुर शास्त्री वार्ड ..... ओबीसी मुक्त
वार्ड क्रमांक7...... बाल गंगाधर वार्ड.... ओबीसी महिला
वार्ड क्रमांक 8....... महात्मा गांधी वार्ड...... सामान्य महिला
वार्ड क्रमांक 9 लाला लाजपत राय वार्ड ..... S.C.अनुसूचित जाति मुक्त
वार्ड क्रमांक..10... पंडित जवाहरलाल नेहरू वार्ड .... सामान्य मुक्त
वार्ड क्रमांक 11 अब्दुल कलाम वार्ड .... सामान्य मुक्त
वॉर्ड क्रमांक 12.... सरदार वल्लभभाई पटेल वार्ड ....S.T अनुसूचित जाति महिला
वार्ड क्रमांक 13.... चंद्रशेखर आजाद वार्ड .......सामान्य मुक्त
वार्ड क्रमांक 14.....रानी लक्ष्मीबाई वार्ड .....ओबीसी महिला
वार्ड क्रमांक 15....—डॉ राजेंद्र प्रसाद वर्ड .......सामान्य महिला
आरक्षण की संभावित तस्वीर सामने आते ही शिवपुर-चरचा के राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौन दावेदार अपने पुराने वार्ड से चुनावी मैदान में उतर पाएगा और किसे नए वार्ड की तलाश करनी पड़ेगी।खासकर वे संभावित प्रत्याशी, जिन्होंने पिछले कई महीनों से किसी खास वार्ड में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की है, उनके लिए आरक्षण सूची निर्णायक साबित हो सकती है। यदि उनका वार्ड महिला, एससी, एसटी या ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित हो गया तो वर्षों से तैयार की गई राजनीतिक रणनीति को एक झटके में बदलना पड़ सकता है।
इसके विपरीत सामान्य मुक्त वार्डों की संख्या और स्थिति कई पुराने तथा नए दावेदारों के लिए राजनीतिक दरवाजे खोल सकती है। ऐसे वार्डों में टिकट को लेकर भाजपा-कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों में भी अंदरूनी खींचतान बढ़ने की संभावना है।
अध्यक्ष पद पर महिला आरक्षण ने पहले ही बदली सियासी दिशा.......
नगर पालिका अध्यक्ष पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने के बाद शिवपुर-चरचा की राजनीति में महिलाओं की भूमिका अचानक केंद्र में आ गई है। कई संभावित महिला दावेदार सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी सक्रियता बढ़ा रही हैं।
लेकिन अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल होने के लिए केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता ही पर्याप्त नहीं होगी। वार्ड स्तर पर पार्षदों का गणित, राजनीतिक दलों का टिकट वितरण, स्थानीय समीकरण और चुनाव परिणाम के बाद बनने वाला बहुमत—ये सभी कारक अध्यक्ष पद के लिए निर्णायक होंगे।इसलिए अध्यक्ष पद की दौड़ को केवल व्यक्तिगत दावेदारी के बजाय 15 वार्डों के चुनावी परिणामों से जोड़कर देखना होगा।
नजर जिला निर्वाचन कार्यालय की सूची पर.......शिवपुर-चरचा की चुनावी राजनीति फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां संभावित प्रत्याशियों के पास तैयारियां करने का समय तो सीमित है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण Samiksha सूचना—वार्ड आरक्षण—अभी सामने नहीं आई है।
विगत चार चुनावों के रोस्टर के आधार पर तैयार किए गए इस संभावित आकलन से यदि आधिकारिक आरक्षण सूची काफी हद तक मेल खाती है तो कई दावेदारों की रणनीति मजबूत हो सकती है अब गेंद जिला निर्वाचन कार्यालय के पाले में है। आरक्षण सूची जारी होते ही शिवपुर-चरचा में लंबे समय से शांत पड़ी चुनावी राजनीति में अचानक उबाल आने की संभावना है। इसके बाद शुरू होगा टिकट का खेल, दावेदारों की दौड़, समर्थकों की लामबंदी और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने का असली राजनीतिक अभियान।फिलहाल शिवपुर-चरचा के संभावित प्रत्याशियों की निगाह एक ही सवाल पर टिकी है—"आरक्षण की लॉटरी में किसका नंबर आएगा और किसकी चुनावी बिसात पलट जाएगी

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