कोरिया बैकुंठपुर । भगवान श्रीजगन्नाथ की विश्वविख्यात रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और सामाजिक समरसता का अद्भुत प्रतीक है। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलने वाली इस भव्य रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक प्रस्थान करते हैं। इस दिव्य यात्रा में लाखों श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर, अर्थात गुंडिचा मंदिर, जाने के लिए वर्ष में एक बार अपने भक्तों के बीच निकलते हैं। इस अवसर पर भगवान स्वयं मंदिर की सीमाओं से बाहर आकर हर जाति, वर्ग और समुदाय के लोगों को समान रूप से दर्शन देते हैं। यही कारण है कि रथयात्रा को सामाजिक समानता और मानवता का महापर्व भी कहा जाता है।
रथयात्रा से जुड़ी एक अत्यंत रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार माता सुभद्रा ने अपने दोनों भाइयों भगवान जगन्नाथ और बलभद्र से द्वारका नगरी का भ्रमण कराने की इच्छा व्यक्त की। बहन की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाइयों ने रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण कराया। इसी घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष रथयात्रा निकाली जाती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की वृंदावन लीला और भक्तों से मिलने की भावना का प्रतीक भी यह यात्रा मानी जाती है।
रथयात्रा का एक विशेष आकर्षण तीनों भव्य रथ हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तालध्वज तथा माता सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है। इन रथों का निर्माण हर वर्ष नए पवित्र वृक्षों की लकड़ी से पारंपरिक विधि और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ किया जाता है। हजारों कारीगर कई सप्ताह तक मेहनत कर इन रथों को तैयार करते हैं।
रथयात्रा के दौरान 'छेरा पहरा' नामक परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। इसमें पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से भगवान के रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा इस बात का संदेश देती है कि भगवान के समक्ष राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं तथा सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित जगन्नाथाष्टकम् में भी भगवान जगन्नाथ का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वे रथयात्रा के मार्ग पर भक्तों की स्तुतियों और भजनों को करुणापूर्वक सुनते हैं तथा समस्त संसार के सच्चे हितैषी हैं। यही भाव इस महापर्व की आत्मा है।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल ओडिशा तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश-विदेश के अनेक शहरों में भी श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित की जाती है। यह पर्व प्रेम, भक्ति, सेवा, समानता और लोककल्याण का संदेश देते हुए करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उस अमूल्य धरोहर का प्रतीक है, जो संपूर्ण मानवता को एक सूत्र में बांधने का संदेश देती है। कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर में भारी बारिश के बीच लोगों ने रथ यात्रा निकालकर आस्था समर्पण और समानता का परिचय दिया।

0 टिप्पणियाँ