माँ काली का दिव्य प्राकट्य – अधर्म के अंत और धर्म की पुनर्स्थापना की अलौकिक कथा


कोरिया बैकुंठपुर। सनातन धर्म में माँ काली को आदिशक्ति का सबसे प्रचंड, तेजस्वी और न्यायप्रिय स्वरूप माना गया है। जब-जब संसार में अधर्म, अत्याचार, अन्याय और अहंकार अपनी चरम सीमा पर पहुँचे, तब-तब माँ ने अपने उग्र रूप में प्रकट होकर दुष्ट शक्तियों का संहार किया और धर्म की पुनर्स्थापना की। माँ काली की दिव्य कथा केवल असुरों के विनाश की गाथा नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति, साहस और संकल्प का होना आवश्यक है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक समय ऐसा आया जब पृथ्वी पर दैत्य और अधर्मी शक्तियाँ अत्यंत बलवान हो गईं। उनके अत्याचारों से देवता, ऋषि-मुनि और सामान्य जन भयभीत हो उठे। यज्ञ, तप और धर्म-कर्म बाधित होने लगे तथा चारों ओर अन्याय का वातावरण फैल गया। तब समस्त देवता एकत्र होकर आदिशक्ति की शरण में पहुँचे और विनम्र भाव से प्रार्थना की—"हे जगदंबा! अब केवल आपकी दिव्य शक्ति ही इस संसार को अधर्म से मुक्त कर सकती है।"

देवताओं की करुण पुकार सुनकर आदिशक्ति ने अपने उग्रतम स्वरूप माँ काली को प्रकट किया। उनका वर्ण घोर अंधकार के समान श्याम था, विशाल खुले केश आकाश की अनंतता का प्रतीक थे और उनके नेत्र अग्नि की ज्वाला की भाँति प्रज्वलित हो रहे थे। उनके गले में मुंडमाला सुशोभित थी, जो अहंकार, पाप और अधर्म के अंत का प्रतीक मानी जाती है। उनके हाथों में त्रिशूल, खड्ग और कमल सुशोभित थे। त्रिशूल न्याय और धर्म की रक्षा का, खड्ग दुष्टों के विनाश का तथा कमल करुणा, पवित्रता और सृष्टि के संतुलन का संदेश देता है।

माँ काली जब रणभूमि में उतरीं तो उनके दिव्य तेज से संपूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं। उनके प्रत्येक कदम के साथ अधर्म की शक्तियाँ कमजोर पड़ने लगीं। दुष्टों का अभिमान चूर-चूर हो गया और देवताओं का आत्मविश्वास लौट आया। माँ ने अपने अद्वितीय पराक्रम से असुरों का संहार कर धर्म की पुनः स्थापना की और संसार को भय तथा अत्याचार से मुक्त कराया।

युद्ध समाप्त होने के बाद भी माँ का उग्र रूप शांत नहीं हुआ। उनका प्रचंड क्रोध संपूर्ण सृष्टि के लिए चिंता का विषय बन गया। तब भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए स्वयं को माँ के मार्ग में लेटा दिया। युद्धोन्माद में आगे बढ़ती माँ काली का चरण जैसे ही भगवान शिव के वक्ष पर पड़ा, उन्हें अपने उग्र स्वरूप का बोध हुआ। उसी क्षण उन्होंने विनम्रता और आत्मसंयम का परिचय देते हुए अपनी जीभ बाहर निकाल ली। यह दृश्य आज भी माँ काली की सबसे प्रसिद्ध प्रतिमा और स्वरूप के रूप में पूजित है। इसके साथ ही उनका क्रोध शांत हुआ और समस्त ब्रह्मांड में शांति, संतुलन और मंगल का प्रकाश फैल गया।

इसके उपरांत देवताओं ने माँ की स्तुति करते हुए प्रार्थना की—

"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"

यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति आवश्यक है, अहंकार का अंत निश्चित है और न्याय के लिए प्रयुक्त शक्ति का अंतिम लक्ष्य करुणा, शांति और लोककल्याण होना चाहिए। माँ काली अपने भक्तों के लिए भय का नहीं, बल्कि सुरक्षा, निर्भयता, न्याय, आत्मबल और धर्म की विजय का शाश्वत प्रतीक हैं। उनकी आराधना व्यक्ति को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, सत्य का साथ देने और जीवन में साहस एवं आत्मविश्वास बनाए रखने की प्रेरणा प्रदान करती है।

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