«ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाख्यायै नमः।
नमामि त्वां कामरूपे, जगदम्बे सनातनि।
त्रैलोक्यजननीं देवीं, सिद्धविद्याप्रदायिनीम्॥१॥»
भावार्थ:
हे कामरूप पीठ में विराजमान सनातन जगदम्बा! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप तीनों लोकों की जननी हैं तथा साधकों को सिद्धि और दिव्य ज्ञान प्रदान करने वाली आदिशक्ति हैं।
«रक्ताम्बरधरे देवि, रक्तपद्मासनस्थिते।
करुणामृतवर्षिण्यै, नमोऽस्तु परमेश्वरि॥२॥»
भावार्थ:
हे रक्तवर्ण वस्त्र धारण करने वाली देवी! रक्तकमल पर विराजमान होकर आप अपनी करुणा का अमृत समस्त भक्तों पर बरसाती हैं। आपको बार-बार प्रणाम है।
«त्रिपुरे भैरवी शक्ते, कालिके कामदायिनि।
योगिनीहृदयावासे, पालय मां कृपानिधे॥३॥»
भावार्थ:
हे त्रिपुरभैरवी स्वरूपिणी! हे कालिका! आप समस्त योगिनियों के हृदय में निवास करती हैं। कृपा करके मेरी रक्षा करें और मेरे जीवन को धर्ममय बनाएं।
«महामाये महाविद्ये, सर्वतन्त्रस्वरूपिणि।
ज्ञानं भक्तिं च मे देहि, मोक्षमार्गप्रकाशिनि॥४॥»
भावार्थ:
हे महामाया! हे दशमहाविद्याओं की अधिष्ठात्री! आप समस्त तंत्रों का सार हैं। मुझे ज्ञान, निष्काम भक्ति और मोक्षमार्ग का प्रकाश प्रदान करें।
«कामाख्ये कामपूर्णे त्वं, भक्तवत्सल मातरि।
दुःखदारिद्र्यनाशिन्यै, नमस्ते विश्वमातरि॥५॥»
भावार्थ:
हे माँ कामाख्या! आप भक्तों की समस्त शुभ कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं। आप दुःख, भय और दरिद्रता का नाश करती हैं। हे विश्वमाता! आपको बारम्बार प्रणाम।
«ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाख्यायै नमो नमः॥»
समर्पण प्रार्थना
"हे माँ कामाख्या! मेरे मन, वचन और कर्म को पवित्र बनाइए। मेरे भीतर सद्बुद्धि, श्रद्धा, संयम और आत्मबल का संचार कीजिए। आपकी कृपा से मेरा जीवन धर्म, करुणा और ईश्वर-भक्ति के मार्ग पर अग्रसर हो।"
टिप्पणी:
रुद्रयामल तंत्र एक प्राचीन तांत्रिक ग्रंथ है, परंतु इसका संपूर्ण प्रामाणिक संस्कृत पाठ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है और विभिन्न पांडुलिपियों में पाठभेद भी मिलते हैं। इसलिए ऊपर प्रस्तुत स्तुति रुद्रयामल तंत्र, शाक्त परंपरा तथा माँ कामाख्या की उपासना में वर्णित भावों से प्रेरित एक भावानुवादात्मक भक्तिपरक रचना है, न कि रुद्रयामल तंत्र का शब्दशः उद्धरण।

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