कोरिया छत्तीसगढ़। पुरी धाम स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर केवल वैष्णव परंपरा का ही नहीं, बल्कि शाक्त और तांत्रिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। मंदिर परिसर में विराजमान माँ विमला देवी को इस पवित्र धाम की अधिष्ठात्री एवं रक्षक देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को अर्पित किया गया भोग तब तक केवल प्रसाद माना जाता है, जब तक उसे माँ विमला के चरणों में समर्पित न कर दिया जाए। माँ विमला को अर्पण के पश्चात ही वही प्रसाद महाप्रसाद का स्वरूप प्राप्त करता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माँ विमला 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी हैं। माना जाता है कि माता सती की नाभि इस स्थान पर गिरी थी। यही कारण है कि जगन्नाथ धाम में वैष्णव और शाक्त परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। मंदिर की सभी प्रमुख धार्मिक परंपराओं में माँ विमला का विशेष स्थान है।
भगवान जगन्नाथ को प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन और छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद यह भोग माँ विमला के मंदिर में ले जाकर समर्पित किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार देवी की स्वीकृति मिलने के बाद ही यह प्रसाद महाप्रसाद कहलाता है, जिसे सभी जाति, वर्ग और समुदाय के लोग समान भाव से ग्रहण करते हैं। महाप्रसाद को श्रद्धा, समानता और सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है।
आषाढ़ मास की रथयात्रा के अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी धाम पहुंचते हैं और भगवान जगन्नाथ के दर्शन के साथ माँ विमला के भी दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की कृपा के साथ माँ विमला की कृपा प्राप्त होने पर भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
जय माँ विमला।
जय जगन्नाथ।

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