ॐ श्रीगणेशाय नमः। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ श्रीकामाख्यायै नमः।
नमामि नीलाचल-वासिनीं, आदिशक्तिं सनातनीम्। जगन्मातरं महादेवीं, कामाख्यां वरदायिनीम्॥
प्रथम श्लोक
जयति जयति कामाख्ये, नीलाचल-निवासिनि। रक्ताम्बरा महेशानि, भक्तानुग्रहकारिणि॥
अर्थ
हे नीलाचल पर्वत पर विराजमान माँ कामाख्या! आपकी बार-बार जय हो। आप रक्तवर्ण वस्त्र धारण करने वाली, भगवान महादेव की परम शक्ति तथा समस्त भक्तों पर कृपा और अनुग्रह बरसाने वाली जगज्जननी हैं। आपका स्मरण मात्र जीवन के अंधकार को दूर कर देता है।
द्वितीय श्लोक
चतुर्भुजा त्रिनयनी, करुणामृत-वर्षिणी। नृत्यरता जगदम्बे, सर्वमङ्गलकारिणी॥
अर्थ
हे चार भुजाओं और तीन नेत्रों वाली माँ! आप करुणा के अमृत की वर्षा करती हैं। आपका दिव्य नृत्य सम्पूर्ण सृष्टि में ऊर्जा, चेतना और जीवन का संचार करता है। आप सम्पूर्ण जगत का मंगल करने वाली आदिशक्ति हैं।
तृतीय श्लोक
खड्गं त्रिशूलं कमलं, वरदाभय-शोभिते। भक्तहृदि सदा देवि, प्रेमभक्तिं प्रदेहि मे॥
अर्थ
हे देवी! आपके हाथों में खड्ग, त्रिशूल और कमल सुशोभित हैं। एक हाथ से आप अभय देती हैं और दूसरे से वरदान प्रदान करती हैं। कृपया मेरे हृदय में सदा निवास करें तथा मुझे निष्काम प्रेम, अटूट श्रद्धा और सच्ची भक्ति प्रदान करें।
चतुर्थ श्लोक
कालिके कामरूपेशि, पराशक्ते सनातनि। सिद्धिं बुद्धिं शुभं सौख्यं, देहि मे जगदम्बिके॥
अर्थ
हे कालिका! हे कामरूप की अधिष्ठात्री! हे सनातन पराशक्ति! मुझे सिद्धि, सद्बुद्धि, शुभता, सुख, समृद्धि तथा धर्ममय जीवन का आशीर्वाद प्रदान करें। आपके बिना कोई साधना पूर्ण नहीं होती।
पंचम श्लोक
त्वमेव शक्तिः सर्वेषां, त्वमेव जगदीश्वरी। त्वमेव मम सर्वस्वं, रक्ष मां कामरूपिणि॥
अर्थ
हे माँ! समस्त प्राणियों की शक्ति आप ही हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की अधिष्ठात्री आप ही हैं। मेरे लिए भी आप ही सर्वस्व हैं। हे कामरूपिणी! जीवन के प्रत्येक संकट में मेरी रक्षा करें और मुझे सदैव अपने चरणों में स्थान दें।
विस्तृत नृत्य-स्तुति
नृत्यसि त्वं जगन्माते, सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि। तव नूपुर-निनादेन, कम्पते सकलं जगत्॥
अर्थ:
हे माँ! आपका दिव्य नृत्य ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार का आधार है। आपके चरणों के नूपुरों की ध्वनि से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चेतन हो उठता है।
भ्रमन्ति ग्रह-नक्षत्रा, तव नृत्यस्य लीलया। देवा मुनयश्च सर्वे, स्तुवन्ति त्वां मुहुर्मुहुः॥
अर्थ:
आपके नृत्य की लय से ग्रह, नक्षत्र और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गतिमान हैं। देवता और ऋषि-मुनि निरन्तर आपकी स्तुति करते हैं।
त्वमेव कुण्डलिनी शक्तिः, योगिनां हृदयेश्वरी। मूलाधारस्थितां देवीं, सहस्रारे प्रकाशिनीम्॥
अर्थ:
आप ही योगियों की कुण्डलिनी शक्ति हैं, जो मूलाधार से सहस्रार तक साधक को परम चेतना का अनुभव कराती हैं।
भक्तानां दुःखहन्त्री त्वं, दारिद्र्यभय-नाशिनी। आनन्दनृत्यसंयुक्ता, मोक्षद्वार-प्रकाशिनी॥
अर्थ:
आप भक्तों के समस्त दुःख, भय और दरिद्रता का नाश करती हैं। आपका आनंदमय नृत्य मोक्ष के द्वार खोल देता है।
प्रार्थना
हे माँ कामाख्या! मेरे भीतर की अज्ञानता का नाश करें। मेरे मन में ज्ञान, विवेक, साहस और करुणा का प्रकाश भर दें। मेरे जीवन को धर्म, सत्य और सेवा के मार्ग पर चलाएँ। मेरी प्रत्येक श्वास आपके नाम का जप बने और मेरा प्रत्येक कर्म आपकी पूजा बने।
फलश्रुति
यः पठेत् श्रद्धया नित्यं, कामाख्याः स्तुतिमुत्तमाम्। तस्य सिद्धिर्भवेद् शीघ्रं, सौभाग्यं च दिने दिने॥
विद्या, लक्ष्मीः, यशः, कीर्तिः, आरोग्यं च निरन्तरम्। भक्तिर्मुक्तिश्च लभ्येते, कामाख्याः कृपया ध्रुवम्॥
अर्थ
जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस स्तुति का नित्य पाठ करता है, उसे माँ कामाख्या की कृपा से सिद्धि, सौभाग्य, विद्या, आरोग्य, यश, समृद्धि तथा अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
समापन मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कामाख्यायै नमः। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पराशक्त्यै नमः। जय जय श्रीकामाख्या मातः। जय आदिशक्ति। जय जगदम्बा। जय माँ कामाख्या।

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