पौष पूर्णिमा पर सरगुजा अंचल में छेर-छेरता पर्व की धूम, माघी स्नान और कल्पवास का शुभारंभ


कोरिया बैकुंठपुर। पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर सरगुजा अंचल सहित पूरे छत्तीसगढ़ में परंपरागत छेर-छेरता पर्व पूरे हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व छत्तीसगढ़ी संस्कृति, सामूहिकता और आपसी भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। पौष पूर्णिमा के साथ ही आज से माघ माह का शुभारंभ होता है, जिसके चलते श्रद्धालुओं द्वारा सूर्योदय से पूर्व माघी स्नान प्रारंभ किया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माघ माह में प्रतिदिन स्नान, दान और पूजन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

इसी के साथ आज से प्रयागराज में कल्पवास का भी आरंभ हो गया है। देश-प्रदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालु संगम क्षेत्र में एक माह तक रहकर नियमित स्नान, जप-तप और साधना करेंगे। कल्पवास को आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है। छत्तीसगढ़ और सरगुजा अंचल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रयागराज के लिए रवाना हुए हैं।

सरगुजा अंचल में पौष पूर्णिमा का दिन विशेष रूप से छेर-छेरता पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बच्चे, युवा और बुजुर्ग समूह बनाकर गांव-गांव, घर-घर जाकर छेरता मांगते हैं। घरों से उन्हें धान, चावल और अन्य अन्न प्रदान किया जाता है। यह परंपरा न केवल दान और सहयोग की भावना को मजबूत करती है, बल्कि समाज में समानता और एकता का संदेश भी देती है।

दिनभर एकत्र किए गए धान और चावल से शाम को गांव के किसी एक स्थान पर सामूहिक रूप से भोजन तैयार किया जाता है, जिसे सभी लोग मिलकर खाते हैं। यह सामूहिक भोज सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण है। वहीं, घर-घर में पारंपरिक पुड़िया बनाई जाती हैं, जिनका विशेष महत्व होता है। महिलाएं पूरे उत्साह के साथ पूजा-पाठ कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

छेर-छेरता का यह दिन ग्रामीण जीवन में एक और महत्वपूर्ण पहलू से जुड़ा होता है। आज के दिन गांवों में चरवाहों और कृषि कार्य में लगे श्रमिकों का पुराना साल पूरा माना जाता है। कल से उनके लिए नया कार्य वर्ष प्रारंभ होता है। इस अवसर पर मालिक और श्रमिक एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और नए वर्ष के लिए सहमति व विश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं।

पौष पूर्णिमा और छेर-छेरता पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और सामाजिक एकजुटता को भी दर्शाते हैं। गांवों में उल्लास, भक्ति और आपसी सहयोग का वातावरण बना हुआ है।

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