₹5 में राज कुमार की चाय और ₹5 में वासुदेव का समोसा ....... महंगाई की आंधी मे अडिग चरचा .... ना भाषण ना पोस्टर.... सादगी और संतोष की मिसाल ....



नीरज गुप्ता की विशेष रिपोर्ट 

कोरिया चरचा कालरी....जहां हर सुबह महंगाई नए दामों के साथ आंख खोलती है, वहीं चरचा कालरी में चायवाले राजकुमार मोदी और साइकिल पर समोसा बेचने वाले वासुदेव पिछले कई दशकों से महंगाई को ठेंगा दिखाते हुए इंसानियत और संतोष की मिसाल बने हुए हैं।देशभर में महंगाई को लेकर रोज़ नई चर्चाएं होती हैं—कभी रसोई गैस पर, कभी दूध-शक्कर पर, तो कभी चाय-पानी तक पर, लेकिन इन तमाम चर्चाओं के बीच यदि किसी ने चरचा कालरी को वास्तव में चर्चित किया है, तो वे हैं ₹5 की चाय वाले राजकुमार मोदी और ₹5 के समोसे वाले वासुदेव। इन दोनों ने बिना मंच, बिना भाषण और बिना नारे के महंगाई पर ऐसा व्यंग्यात्मक प्रहार किया है, जो बड़े-बड़े आर्थिक विश्लेषणों से कहीं अधिक असरदार है। यह दो साधारण चेहरे असाधारण काम कर रहे हैं। 

चरचा कालरी के श्रमवीर स्टेडियम गेट के पास पिछले 30 वर्षों से चाय उबालते राजकुमार मोदी हैं जिनकी चाय की गंज में गैस के बढ़ते दाम भले उबलते हो पर कप में चाय आज भी₹5 की ही उतरती है केतली संभाले खड़े राजकुमार मोदी आज भी उतनी ही सादगी से ग्राहकों का स्वागत करते हैं, जितना वर्षों पहले करते थे। उस दौर में जब चाय 60 पैसे में मिला करती थी, और स्पेशल चाय ₹75 पैसे की थी तब उन्होंने चाय बनाने का काम शुरू किया था। समय बदला, कीमतें बदलीं, गैस सिलेंडर से लेकर चायपत्ती तक सब कुछ कई गुना महंगा हुआ, मगर राजकुमार की चाय का दाम मानो समय के साथ चलने से इनकार कर बैठा—आज भी ₹5की चाय  पिलाते है बाहर से आने वाला कोई ग्राहक जब अनजाने में ₹10 का नोट बढ़ाता है, तो राजकुमार मोदी बिना कोई भाषण दिए, शांति से ₹5 लौटाकर यह एहसास करा देते हैं कि महंगाई कोई मजबूरी नहीं, बल्कि सोच का परिणाम भी हो सकती है। उनकी दुकान पर सुबह से शाम तक ग्राहकों की भीड़ रहती है और प्रतिदिन लगभग 50 लीटर दूध की चाय बनती है—जो इस बात का प्रमाण है कि सस्ती चीज़ें आज भी भरोसे के दम पर चल सकती हैं।

इसी क्रम में चरचा कालरी की गलियों में साइकिल पर टोकनी लटकाए घूमते छोटे से माइक में  वासुदेव पिछले 18 वर्षों से समोसे को बढ़ती महंगाई से बचाते आ रहे हैं  उन्होंने अपने कारोबार की शुरुआत ₹10 में चार समोसे से की थी। समय ने करवट बदली, तो अब ₹10 में दो समोसे देते हैं अर्थात्  एक समोसा आज भी ₹5 का ही है।  शाम 5 बजे के लगभग जब वासुदेव की साइकिल निकलती है तो महज 2 घंटे में ही वह लगभग  300 समोसा बेच लेते हैं वासुदेव की साइकिल के पीछे  कैरियर में रखी समोसे की टोकनी और छोटे से टेप रिकॉर्डर जिसमे लगातार ₹5 में समोसा आप भी खाइए और अपने परिवार को भी खिलाएं का प्रचार चलता रहता है महंगाई के इस दौर में उनका समोसा केवल नाश्ता नहीं, बल्कि आम आदमी की राहत है। स्वाद में कुरकुरा और संदेश में करारा—वासुदेव का समोसा उस व्यवस्था पर करारा है जहां दाम बढ़ते हैं पर संतोष घटता जाता हैvआज जब होटल और ढाबों में चाय ‘स्पेशल’ बनकर ₹25–₹50 तक पहुंच चुकी है और समोसा ‘प्रीमियम स्नैक’ की श्रेणी में आ गया है, तब चरचा में ₹5 की चाय और ₹5 का समोसा यह सवाल खड़ा करता है—क्या महंगाई सच में उतनी ही मजबूर है, जितनी बताई जाती है? वासुदेव के साथ ही उनके और भी परिजन है जो प्रतिदिन समोसा बेचते हैं। 

राजकुमार मोदी और वासुदेव दोनों ही कम लाभ में संतोष, सरल व्यवहार और ईमानदार मेहनत की ऐसी मिसाल हैं, जो यह साबित करती है कि व्यापार केवल मुनाफ़े का गणित नहीं, बल्कि समाज से जुड़ाव का माध्यम भी हो सकता है। इनकी चाय और समोसे की दुकान असल में महंगाई के खिलाफ चल रहे छोटे-छोटे आंदोलन है कहना गलत नहीं होगा कि चरचा की चर्चा तो यूं ही चलती रहेगी, लेकिन चरचा को दिलों में जगह दिलाने का काम इन दोनों सादे लेकिन असाधारण व्यक्तित्वों ने किया है। महंगाई के इस शोरगुल भरे दौर में ₹5 की चाय और ₹5 का समोसा न सिर्फ़ पेट भरते हैं, बल्कि सोच को भी झकझोरते हैं—और यही इनकी सबसे बड़ी जीत है। उनकी कार्यशैली समाज को यह याद दिलाती है कि व्यापार से पहले भी मानवता होती है। 

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