कोरिया बैकुंठपुर। भारत प्राचीन काल से ही विश्व कल्याण और सर्वजन सुखाय की भावना पर आधारित एक ऐसी भूमि मानी जाती है, जहाँ सनातन धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन शैली और मानवीय मूल्यों का आधार रहा है। “वसुधैव कुटुंबकम्” जैसे विचारों के माध्यम से सनातन परंपरा ने हमेशा समूचे विश्व को एक परिवार के रूप में स्वीकार किया है। लेकिन इतिहास के उतार-चढ़ाव में यह संस्कृति कई बार गंभीर चुनौतियों से गुज़री है।
सन 1192 से प्रारंभ हुए बाहरी आक्रमणों, सत्ता संघर्षों और औपनिवेशिक दबावों ने न केवल राजनीतिक रूप से भारत को प्रभावित किया, बल्कि धर्म, संस्कृति और परंपराओं को भी गहरी चोट पहुँचाई। अनेक विद्वानों और इतिहासकारों के अनुसार, उस दौर में सनातन संस्कृति से जुड़े साधु, संत, तपस्वी और आम नागरिक लाखों की संख्या में अपने धरोहर और परंपरा की रक्षा के लिए जंगलों, पहाड़ों और दूरस्थ क्षेत्रों में चले गए। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में रहकर भी अपनी संस्कृति के मूल तत्व— संस्कृत भाषा, वेद-वेदांत, योग, आयुर्वेद, संगीत, दर्शन और कर्मयोग —को संरक्षित रखा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी पहचान और जड़ों से जुड़ी रहें।
आज स्वाधीनता के 75 से अधिक वर्ष बाद भी, देश के अनेक बुद्धिजीवियों का मानना है कि धन, बल, बुद्धि और आधुनिक षड्यंत्रपूर्ण रणनीतियों के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों को कमजोर करने की कोशिशें जारी हैं। तेजी से बदलते सामाजिक ढांचे में धर्म और संस्कृति से जुड़े प्रतीकों को चुनौती दी जा रही है। ऐसे समय में राष्ट्र और समाज की एकता, बुनियादी मूल्य और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए व्यापक जनभागीदारी की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा यह संदेश दिया जा रहा है कि राष्ट्र की मजबूती केवल सीमा सुरक्षा से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक चेतना से भी होती है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक, युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक यह आह्वान अब तेज हो रहा है कि हर भारतीय को तन, मन, धन, बुद्धि और विवेक के साथ राष्ट्रहित में योगदान देना चाहिए। यह योगदान केवल युद्धभूमि या राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, सेवा, अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक संवर्धन जैसे अनेक क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है।
गौ-संरक्षण, पर्यावरण संतुलन, भारतीय भाषाओं और परंपराओं का विकास, परिवार और समाज में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना तथा राष्ट्र की अखंडता की रक्षा आज समय की मांग के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रत्येक नागरिक अपनी क्षमता और जिम्मेदारी के अनुसार राष्ट्र के लिए समर्पित भाव से कार्य करे तो भारत पुनः विश्व में ज्ञान, शांति और संस्कृति का प्रकाशस्तंभ बन सकता है।
बनस्थली कैलाशपुर क्षेत्र में भी सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा इसी भावना के साथ जागरूकता का संदेश दिया जा रहा है। यहाँ के नागरिकों ने एक स्वर में राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित होने का संकल्प व्यक्त किया। उनका संदेश स्पष्ट है—
“राष्ट्र सर्वोपरि है, और राष्ट्रहित में एकजुट होकर कार्य करना ही आज की आवश्यकता है।”
अंत में, इस आह्वान के साथ भावनाएँ एक सूत्र में बंधती हैं—
“जय गौ माता! जय भारत माता!”

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