कोरिया बैकुंठपुर । “ऊँ माँ गुरु की जय” के जयघोष के साथ अघोर पंथ के साधकों के बीच “अघोर वचन शास्त्र माला-6” के वचनों का पाठ हाल ही में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अघोरेश्वर द्वारा कहे गए इन वचनों में साधक को आध्यात्मिक उन्नति का सरल, स्पष्ट और यथार्थ मार्ग दिखाया गया है। माला-6 के वचन क्रमांक 41 से 45 में अंतर्मन, साधना, सत्संग और साधक के जीवन-संस्कारों से जुड़ी विशेष शिक्षाएँ सामने आती हैं, जिन्हें साधकों द्वारा आत्म-विकास और आचरण के मापदंड के रूप में ग्रहण किया जा रहा है।
सबसे पहले वचन 41 में अघोरेश्वर चित्त की पवित्रता को साधना का मूल आधार बताते हैं। उनका कहना है कि जिसका चित्त “अकल्पित और उचित्त” होता है, वह आकाश की तरह विस्तृत, स्थिर और निर्भय बन जाता है। इसके विपरीत अस्थिर, द्वंद्वग्रस्त और संदेहपूर्ण चित्त भय, भ्रम और मानसिक अशांति की ओर ले जाता है, जो साधना मार्ग में अनेक बाधाएँ उत्पन्न करता है। अघोरेश्वर यही कारण बताते हैं कि औघड़ साधु चित्ताकाश में विहंगम गति से विचरण कर पाते हैं—क्योंकि उनका चित्त आकाश की तरह निर्मल और व्यापक होता है।
वचन 42 में औघड़ों की दुर्लभता का उल्लेख है। अघोरेश्वर कहते हैं कि सच्चे औघड़ साधु बहुत कम संख्या में अवतरित होते हैं, मानो किसी महान वंश के दुर्लभ उत्तराधिकारी की भाँति। उनका प्राकट्य किसी विशिष्ट भूभाग पर समय-समय पर होता रहता है। यही कारण है कि औघड़ों की वास्तविक उपस्थिति साधकों में उत्साह और प्रेरणा का स्रोत बनती है।
वचन 43 औघड़ की पहचान पर केंद्रित है। अघोरेश्वर स्पष्ट करते हैं कि जो साधु सत्संग करता है, सज्जनों का संग रखता है, साधु सभा में बैठता है और अघोरेश्वर के मापदंड पर चलता है—उसी में औघड़त्व की योग्यता जन्म लेती है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि औघड़ मार्ग जादू-टोना, तंत्र-मंत्र की अंधविश्वासी धाराओं से परे है। यह विचारधारा आत्मिक पवित्रता, सत्य और साधना पर आधारित है, जिसे बुद्ध की करुणा-प्रधान विचारधारा से भी जोड़ा जा सकता है।
वचन 44 में मंत्र-साधना को अनुशासन और पुरुषार्थ से जोड़ते हुए अघोरेश्वर बताते हैं कि श्रद्धा, वीर्य, बल और उद्योग के बिना मंत्र-साधना फलित नहीं होती। वे यह आश्वासन भी देते हैं कि यदि साधक एक वर्ष तक अघोरेश्वर के उपदेशों का पालन कर साधना करे, तो वह वही सिद्धि प्राप्त कर सकता है, जो सामान्यतः पन्द्रह वर्षों में मिलती है।
माला-6 के वचन 45 में औघड़ साधकों के जीवन-संकल्प का उल्लेख है। अघोरेश्वर बताते हैं कि सच्चे औघड़ आहार न मिलने पर भी सम्मान और मर्यादा को नहीं छोड़ते तथा अपत्नी गुफाओं में समाधिस्थ रहकर साधना जारी रखते हैं। समाज में ऐसे साधकों की दृढ़ता, संयम और समर्पण आज भी प्रेरणा का कारण बनती है।
अघोर पंथ के विद्वानों का मानना है कि ये वचन केवल साधना-पथ नहीं दिखाते, बल्कि मन, चरित्र और जीवन को संतुलित करने का दर्पण भी प्रस्तुत करते हैं—जहाँ भय का नाश, चित्त की शुद्धि और साधना की ऊर्जा मनुष्य को अध्यात्म के उच्च शिखर तक पहुँचाती है।

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