सूरत नहीं, सीरत की पहचान करें: रंग-रूप नहीं, इंसान के विचार, व्यवहार और कर्म होने चाहिए पहचान का आधार, रंग और शारीरिक बनावट के आधार पर भेदभाव करना समाज की संकीर्ण सोच का प्रतीक, सुंदरता का असली पैमाना है इंसानियत और संवेदनशीलता, विजय मानिकपुरी की कलम से विशेष लेख


कोरिया बैकुंठपुर। आज के आधुनिक दौर में विज्ञान, शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में समाज निरंतर प्रगति कर रहा है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि रंग-रूप, चेहरे, कद और शारीरिक बनावट के आधार पर लोगों को आंकने की मानसिकता आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। घर-परिवार से लेकर सामाजिक आयोजनों और सार्वजनिक जीवन तक, किसी व्यक्ति के बाहरी रूप को लेकर टिप्पणियां करना, तुलना करना और उसी आधार पर उसकी योग्यता या व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है।

हमें यह समझने की जरूरत है कि किसी व्यक्ति का रंग, चेहरा, कद या शारीरिक बनावट उसके अपने चुनाव का परिणाम नहीं है। जिसे कोई ईश्वर कहता है, कोई भगवान, कोई अल्लाह और कोई प्रकृति या कुदरत, उसी ने संसार में मनुष्यों को अलग-अलग रूप, रंग और विशेषताएं प्रदान की हैं। जब इन प्राकृतिक विशेषताओं को चुनने में इंसान की कोई भूमिका ही नहीं है, तो फिर इनके आधार पर घमंड करना या किसी दूसरे को हीन भावना से देखना आखिर किस बात का प्रतीक है?

सुंदरता का पैमाना केवल गोरा रंग और आकर्षक चेहरा क्यों?

हमारे समाज में लंबे समय से गोरे रंग, लंबे कद और एक खास तरह की शारीरिक बनावट को सुंदरता का प्रतीक मानने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। इसके विपरीत सांवले रंग, छोटे कद, अधिक वजन या शरीर की अलग बनावट वाले लोगों को कई बार अनावश्यक टिप्पणियों और उपहास का सामना करना पड़ता है। यह सोच न केवल अनुचित है, बल्कि किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को भी गहरी चोट पहुंचा सकती है।

किसी के चेहरे या रंग पर टिप्पणी करना कुछ लोगों को सामान्य मजाक लग सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति को बार-बार ऐसी बातें सुननी पड़ती हैं, उसके मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। कई बार वह स्वयं को दूसरों से कमतर समझने लगता है, लोगों के बीच जाने से कतराता है और अपने व्यक्तित्व को लेकर असहज महसूस करने लगता है।

सवाल यह है कि आखिर किसी इंसान की पहचान उसके चेहरे से क्यों तय की जाए? उसके विचार कैसे हैं, उसका व्यवहार कैसा है, वह दूसरों के प्रति कितना संवेदनशील है, कठिन परिस्थितियों में उसका दृष्टिकोण कैसा रहता है और वह समाज के लिए क्या योगदान देता है—इन बातों को अधिक महत्व क्यों नहीं दिया जाता?

शादी-विवाह में भी रंग और कद को दी जाती है प्राथमिकता,

रंग-रूप को लेकर बनी सामाजिक धारणा का प्रभाव विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में भी स्पष्ट दिखाई देता है। कई बार जीवनसाथी चुनते समय व्यक्ति के स्वभाव, विचारों, जीवन के प्रति दृष्टिकोण, आपसी समझ और जिम्मेदारियों को निभाने की क्षमता से पहले उसके रंग, कद और चेहरे को महत्व दिया जाता है।

कुछ महीने पहले एक मित्र के चाचा ने मुझसे कहा, “एक लड़की बहुत खूबसूरत है। रंग दूध जैसा गोरा है और कद करीब पांच फुट छह इंच होगा। अपने लड़के के लिए पसंद किया है। कैसा रहेगा?”

उनकी बात सुनकर उस समय मैंने चर्चा को आगे नहीं बढ़ाया, लेकिन मन में कई सवाल उठते रहे। क्या किसी लड़की के जीवनसाथी के रूप में उपयुक्त होने का आधार केवल उसका गोरा रंग और लंबा कद हो सकता है? उसके विचार कैसे हैं? उसकी इच्छाएं और सपने क्या हैं? उसका स्वभाव कैसा है? वह परिवार और रिश्तों को किस दृष्टि से देखती है? क्या दोनों एक-दूसरे को समझते हैं? क्या उनके बीच विचारों का सामंजस्य है?

विवाह केवल दो चेहरों का मेल नहीं, बल्कि दो व्यक्तित्वों, दो विचारधाराओं और दो जीवन यात्राओं का साथ है। जीवन में सुख-दुख, जिम्मेदारियां, संघर्ष और अनेक परिस्थितियां आती हैं। ऐसे समय में रिश्ते को मजबूती देने का काम बाहरी सुंदरता नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान, समझदारी और एक-दूसरे के प्रति समर्पण करते हैं।

इसलिए जीवनसाथी का चयन करते समय बाहरी आकर्षण से अधिक उसके व्यक्तित्व, व्यवहार और आपसी अनुकूलता को महत्व दिया जाना चाहिए।

दो सहपाठियों की कहानी, जिसने सुंदरता की सोच पर सवाल खड़े किए,

मेरी कक्षा में दो लड़कियां पढ़ती थीं। उनमें से एक का रंग सांवला था, कद छोटा था और शरीर भारी था। वहीं दूसरी लड़की गोरे रंग की, लंबे कद की और दुबली-पतली थी। बाहरी रूप में दोनों के बीच अंतर था। कुछ लोग सांवली सहपाठी से बातचीत करने में भी संकोच करते थे, जबकि दूसरी लड़की को उसके रूप के कारण अधिक आकर्षक समझा जाता था।

समय बीता और दोनों की शादी हो गई। जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। कुछ समय बाद गोरे रंग वाली सहपाठी के चेहरे पर सफेद दाग उभर आए। आज दोनों सहेलियां हैं और यह प्रसंग हमें जीवन की एक महत्वपूर्ण सच्चाई पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

शरीर और चेहरे की बनावट समय के साथ बदल सकती है। उम्र, परिस्थितियां और विभिन्न प्राकृतिक कारण हमारे बाहरी रूप में परिवर्तन ला सकते हैं। जिस चेहरे या रंग को कभी सुंदरता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता था, उसमें भी बदलाव आ सकता है। लेकिन इन बदलावों से किसी इंसान की गरिमा, उसके मानवीय मूल्य और सम्मान का अधिकार कम नहीं हो जाता।

इस कहानी का उद्देश्य किसी के शरीर में आए बदलाव को सुंदरता या असुंदरता से जोड़ना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि बाहरी रूप को किसी व्यक्ति की संपूर्ण पहचान मान लेना हमारी सोच की सीमा है। इंसान का वास्तविक मूल्य उसके व्यक्तित्व, संवेदनशीलता, व्यवहार और कर्मों में दिखाई देता है।

रंग-रूप के आधार पर भेदभाव, आत्मविश्वास को पहुंचाता है चोट,

रंग और शारीरिक बनावट के आधार पर होने वाला भेदभाव हमेशा खुले रूप में ही सामने नहीं आता। कभी यह मजाक के रूप में होता है, कभी तुलना के रूप में और कभी किसी रिश्ते या अवसर के चयन में दिखाई देता है। कई बार लोग अनजाने में ऐसे शब्द बोल देते हैं, जिनसे सामने वाले व्यक्ति को अपमान और हीनभावना का अनुभव होता है।

किसी को उसके सांवले रंग के कारण चिढ़ाना, छोटे कद पर टिप्पणी करना, वजन को लेकर उपहास करना या चेहरे पर मौजूद किसी निशान अथवा दाग को लेकर मजाक बनाना संवेदनशील व्यवहार नहीं है। हमें समझना चाहिए कि हमारी कही हुई बात किसी दूसरे के मन में लंबे समय तक बनी रह सकती है।

सुंदरता के नाम पर समाज द्वारा बनाए गए सीमित मानदंड लोगों पर एक अनावश्यक दबाव भी पैदा करते हैं। कई लोग केवल दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए अपने रंग और रूप को लेकर चिंतित रहते हैं। बाजार भी इसी मानसिकता का लाभ उठाता है और सुंदर दिखने की चाह को बढ़ावा देता है।

लेकिन हमें यह समझना होगा कि किसी खास रंग या शारीरिक बनावट में ढलना ही सुंदरता नहीं है। हर व्यक्ति की अपनी विशिष्टता होती है और उसी विविधता से समाज की सुंदरता बनती है।

गोरे रंग पर घमंड नहीं, सांवले रंग पर हीनभावना नहीं,

किसी व्यक्ति को अपने गोरे रंग, आकर्षक चेहरे या लंबे कद पर घमंड करने की जरूरत नहीं है। उसी तरह सांवले रंग, छोटे कद, अधिक वजन या समाज के बनाए सौंदर्य मानदंडों पर खरा न उतरने के कारण किसी को स्वयं को कमतर समझने की भी आवश्यकता नहीं है।

इंसान की पहचान उसके जन्मजात रूप से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व और कर्मों से बनती है। एक अच्छा इंसान वह है जो दूसरों की भावनाओं को समझे, जरूरतमंद की सहायता करे, किसी का अपमान न करे और अपने व्यवहार से समाज में प्रेम तथा सद्भाव बढ़ाए।

यदि कोई व्यक्ति बाहरी रूप से आकर्षक है, लेकिन उसके व्यवहार में अहंकार, कटुता और दूसरों के प्रति असम्मान है, तो केवल उसका चेहरा उसे बेहतर इंसान नहीं बना सकता। दूसरी ओर, साधारण दिखने वाला व्यक्ति अपने अच्छे विचारों, सहयोग की भावना और मानवीय संवेदनाओं से अनेक लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

कुदरत की विविधता को स्वीकार करें, इंसानियत को महत्व दें,

प्रकृति ने संसार को विविधता से भर दिया है। फूलों के रंग अलग-अलग हैं, पेड़ों की बनावट अलग है, पक्षियों की आवाजें अलग हैं और मनुष्यों के रंग-रूप भी अलग-अलग हैं। जब प्रकृति की विविधता हमें सुंदर लगती है, तो फिर मनुष्यों के बीच मौजूद विविधता को स्वीकार करने में संकोच क्यों?

हमें कुदरत का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने हमें सोचने, समझने, हंसने, प्रेम करने, रिश्ते निभाने और दूसरों के दुख को महसूस करने की क्षमता दी है। यही वे गुण हैं, जिन्हें हम अपने प्रयासों से और बेहतर बना सकते हैं।

हमारा रंग और चेहरा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन हमारा व्यवहार, हमारी भाषा, हमारा दृष्टिकोण और हमारे कर्म काफी हद तक हमारे अपने चुनाव पर निर्भर करते हैं। इसलिए जीवन में बाहरी रूप को लेकर चिंता करने से अधिक जरूरी है कि हम अपने भीतर मानवीय गुणों का विकास करें।

बदलाव की शुरुआत अपने घर और अपनी सोच से करें,

रंग-रूप पर आधारित भेदभाव को समाप्त करने के लिए किसी बड़े आंदोलन की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है। इसकी शुरुआत हमारे अपने घर, परिवार और व्यवहार से हो सकती है। बच्चों के सामने किसी के रंग, कद या शरीर का मजाक न बनाएं। रिश्ते तय करते समय बाहरी सुंदरता के साथ-साथ विचारों, स्वभाव और आपसी समझ को महत्व दें। किसी व्यक्ति को उसके रूप के कारण कमतर न समझें और न ही ऐसी टिप्पणियों को सामान्य मजाक मानकर अनदेखा करें, जो उसके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाती हैं।

हमें अपने बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि हर इंसान सम्मान का अधिकारी है। किसी का रंग उसके चरित्र का प्रमाण नहीं है, किसी का चेहरा उसकी नीयत नहीं बताता और किसी की शारीरिक बनावट उसकी योग्यता निर्धारित नहीं करती।

एक स्वस्थ और संवेदनशील समाज वही है, जहां व्यक्ति को उसके बाहरी रूप के कारण नहीं, बल्कि उसके गुणों, विचारों और कर्मों के आधार पर सम्मान मिलता है।

निष्कर्ष: इंसान को सूरत से नहीं, सीरत से पहचानिए,

जीवन बहुत छोटा है। इसे रंग-रूप की तुलना, घमंड और हीनभावना में बिताने के बजाय प्रेम, सहयोग, सम्मान और इंसानियत के साथ जीना चाहिए। चेहरे की सुंदरता समय के साथ बदल सकती है, लेकिन अच्छे कर्मों से बनी पहचान लोगों के दिलों में लंबे समय तक जीवित रहती है।

इसलिए किसी को उसके रंग के कारण छोटा न समझें, किसी की शारीरिक बनावट का मजाक न बनाएं और किसी के बाहरी रूप को उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रमाण न मानें। दूसरों की सुंदरता पर टिप्पणी करने से पहले अपने विचारों और व्यवहार की सुंदरता को पहचानें।

याद रखिए—रंग से चरित्र तय नहीं होता, चेहरे से नीयत नहीं पहचानी जाती और बाहरी सुंदरता से इंसानियत का प्रमाण नहीं मिलता। इंसान की असली पहचान उसके विचारों, संवेदनाओं, व्यवहार और कर्मों में छिपी होती है।

— विजय मानिकपुरी

जिला जनसंपर्क अधिकारी 

कोरिया छत्तीसगढ़

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