॥ श्रीदुर्गायै नमः ॥ सन्नद्धसिंहस्कन्धस्थां स्वर्णवर्णां मनोरमाम्। पूर्णेन्दुवदनां दुर्गां वर्णयामि गुणार्णवाम्॥१॥


हिन्दी अर्थ— मैं उन माँ दुर्गा का वर्णन करता हूँ, जो सुसज्जित सिंह के कन्धे पर विराजमान हैं, जिनका वर्ण स्वर्ण के समान दीप्तिमान है, जिनका स्वरूप मनोहर है, जिनका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान है तथा जो समस्त दिव्य गुणों की सागर हैं।

किरीटहारग्रैवेयनूपुराङ्गदकङ्कणैः।

रत्नकाञ्च्या रत्नचित्रकुचकञ्चुकतेजसा॥२॥

हिन्दी अर्थ— माँ दुर्गा मुकुट, हार, गले के आभूषण, नूपुर, बाजूबन्द और कंगनों से सुशोभित हैं। रत्नजटित करधनी तथा रत्नों से सजे वक्षःस्थल के वस्त्र की आभा उनके दिव्य सौन्दर्य को और बढ़ाती है।

विराजमाना रुचिराम्बरा किङ्किणिमण्डिता।

रत्नमेखलया रत्नवासोपरि विभूषिता॥३॥

हिन्दी अर्थ— देवी सुन्दर वस्त्र धारण करके देदीप्यमान हैं। वे छोटी-छोटी घण्टियों से सुसज्जित हैं तथा रत्नजटित मेखला और रत्नों से अलंकृत वस्त्रों द्वारा विभूषित हैं।

वीरशृङ्खलया शोभिचारुपादसरोरुहा।

रत्नचित्राङ्गुलीमुद्रा रत्नकुण्डलमण्डिता॥४॥

हिन्दी अर्थ— माँ दुर्गा के सुन्दर चरणकमल वीरशृङ्खला नामक आभूषण से शोभित हैं। उनकी अँगुलियाँ रत्नजटित मुद्रिकाओं से अलंकृत हैं और उनके कान रत्नों से जड़े कुण्डलों से सुशोभित हैं।

विचित्रचूडामणिना रत्नोद्यत्तिलकेन च।

अनर्घ्यनासामणिना शोभितास्यसरोरुहा॥५॥

हिन्दी अर्थ— देवी का मस्तक विविध रत्नों से बने सुन्दर चूड़ामणि से सुशोभित है। उनके ललाट पर चमकता हुआ रत्नजटित तिलक है और उनके मुखकमल की शोभा अमूल्य नासामणि से और बढ़ जाती है।

भुजकीर्त्या रत्नचित्रकण्ठसूत्रेण चाङ्किता।

पद्माक्षिणी सुबिम्बोष्ठी पद्मगर्भादिभिः स्तुता॥६॥

हिन्दी अर्थ— माँ दुर्गा की भुजाएँ दिव्य भुजाभूषणों से सुशोभित हैं और उनका कण्ठ रत्नजटित आभूषण से अलंकृत है। उनके नेत्र कमल के समान हैं, उनके ओष्ठ सुन्दर बिम्बफल के समान लाल हैं और ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा उनकी स्तुति की जाती है।

कबरीभारविन्यस्तपुष्पस्तबकविस्तरा।

कर्णनीलोत्पलरुचा लसद्भ्रूमण्डलत्विषा॥७॥

हिन्दी अर्थ— देवी के घने केशपाश में पुष्पों के सुन्दर गुच्छे सजे हुए हैं। उनके कानों में लगे नीले कमल अपनी आभा बिखेरते हैं और उनकी भौंहों का मण्डल दिव्य तेज से चमकता है।

कुन्तलानां च सन्तत्या शोभमाना शुभप्रदा।

तनुमध्या विशालोरःस्थला पृथुनितम्बिनी॥८॥

हिन्दी अर्थ— माँ दुर्गा अपने सुन्दर, घुँघराले केशों से सुशोभित होकर भक्तों को शुभ फल प्रदान करती हैं। उनकी कमर सुडौल, वक्षःस्थल विशाल और नितम्ब विस्तृत हैं।

चारुदीर्घभुजा कम्बुग्रीवा जङ्घायुगप्रभा।

असिचर्मगदाशूलधनुर्बाणाङ्कुशादिना॥९॥

हिन्दी अर्थ— देवी की भुजाएँ सुन्दर और लम्बी हैं, उनकी ग्रीवा शंख के समान मनोहर है तथा उनकी दोनों जङ्घाएँ तेजस्वी हैं। वे तलवार, ढाल, गदा, त्रिशूल, धनुष, बाण और अंकुश आदि अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं।

वराभयाभ्यां चक्रेण शङ्खेन च लसत्करा।

दंष्ट्राग्रभीषणास्योत्थ हुङ्कारार्दितदानवा॥१०॥

अर्थ :~ देवी माँ श्री आद्याशक्ति भगवती दुर्गा जी के हाथ वरमुद्रा, अभयमुद्रा, चक्र और शंख से सुशोभित हैं। उनके दाँतों के अग्रभाग से युक्त उग्र मुख से निकलने वाले हुंकार से दानव पीड़ित और भयभीत हो जाते हैं॥

भयङ्करी सुरारीणां सुराणामभयङ्करी।

मुकुन्दकिङ्करी विष्णुभक्तानां मौक्तशङ्करी॥११॥

अर्थ :~ देवी माँ श्री आद्याशक्ति भगवती दुर्गा जी!देवताओं के शत्रुओं के लिए भयङ्कर हैं और देवताओं को अभय प्रदान करती हैं। वह भगवान् मुकुन्द की सेविका के रूप में वर्णित हैं तथा भगवान् श्री हरि विष्णु नारायण जी के भक्तों के लिए मोक्ष अथवा मुक्ति प्रदान करने वाली कल्याणकारी शक्ति हैं॥

सुरस्त्रीकिङ्करीभिश्च वृता क्षेमङ्करी च नः।

आदौ मुखोद्गीर्णनानाम्नाया सर्गकरी पुनः॥१२॥

अर्थ :~ देवी माँ श्री आद्याशक्ति भगवती दुर्गा जी देवाङ्गनाओं की सेविकाओं से घिरी हुई हैं। वह हमारा कल्याण करने वाली हैं। सृष्टि के आरम्भ में उनके मुख से विविध आम्नायों अर्थात् वैदिक परम्पराओं का प्राकट्य होता है और वह पुनः सृष्टि की रचना करने वाली शक्ति के रूप में वर्णित हैं॥

निसर्गमुक्ता भक्तानां त्रिवर्गफलदायिनी।

निशुम्भशुम्भसंहर्त्री महिषासुरमर्दिनी॥१३॥

अर्थ :~ देवी माँ श्री आद्याशक्ति भगवती दुर्गा जी अपने भक्तों को स्वाभाविक रूप से मुक्ति प्रदान करने वाली तथा धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों के फल देने वाली हैं। वह निशुम्भ और शुम्भ का संहार करने वाली तथा महिषासुर का मर्दन करने वाली हैं॥

तामसानां तमःप्राप्त्यै मिथ्याज्ञानप्रवर्तिका।

तमोऽभिमानिनी पायाद्दुर्गा स्वर्गापवर्गदा॥१४॥

 अर्थ :~ जो लोग तामसिक प्रवृत्ति से युक्त हैं, उनके लिए देवी अज्ञान के परिणामों का अनुभव कराने वाली शक्ति के रूप में वर्णित हैं। वह तमोगुण की अधिष्ठात्री हैं। वही माँ दुर्गा भक्तों की रक्षा करती हैं और स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं॥

इमं दुर्गास्तवं पुण्यं वादिराजयतीरितम्।

पठन् विजयते शत्रून्मृत्युं दुर्गाणि चोत्तरेत्॥१५॥

अर्थ :~ श्रीवादिराज यति द्वारा रचित इस पुण्यदायी दुर्गास्तव का पाठ करने वाला साधक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। मृत्यु के भय से उबरता है और जीवन के कठिन संकटों को पार करता है॥

॥ इति श्री वादिराज यति कृतः श्री दुर्गा स्तवः सम्पूर्णः ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः ॐ माँ नर्मदाय नमः ॥

 मातृ श्री नर्मदे हर जीवन भर ॥

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