पौराणिक कथा के अनुसार आदिशक्ति द्वारा सती रूप धारण की कथा मुख्यतः शिवमहापुराण (रुद्रसंहिता - सतीखण्ड), देवीभागवत पुराण, कालीका पुराण और श्रीमद्देवीभागवत में विस्तार से वर्णित है। शास्त्रसम्मत क्रम इस प्रकार है:


1. सृष्टि के आरंभ में संकल्प

सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी ने अपने मानसपुत्र दक्ष प्रजापति को प्रजा वृद्धि का आदेश दिया। दक्ष ने कठोर तपस्या का निश्चय किया, परंतु उनके मन में एक अभिलाषा थी कि स्वयं पराम्बा आदिशक्ति उनकी पुत्री के रूप में अवतरित हों।

2. दक्ष की तपस्या

दक्ष प्रजापति ने विंध्य पर्वत क्षेत्र में जाकर आदिशक्ति की घोर आराधना की। देवीभागवत के अनुसार उन्होंने निराहार रहकर, एकाग्रचित्त से देवी के बीजमंत्रों का जप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आकाश में दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ।

3. आदिशक्ति का दर्शन और वरदान

तपस्या से संतुष्ट होकर आदिशक्ति अपने चतुर्भुजी, दिव्य, कोटि सूर्य सम तेजस्वी स्वरूप में प्रकट हुईं। उन्होंने दक्ष से वर मांगने को कहा।

दक्ष ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की:

"हे जगज्जननी! आप मेरे घर पुत्री रूप में जन्म लेकर मुझे कृतार्थ करें, और भगवान शिव को पति रूप में वरण करें, जिससे शिव-शक्ति का मिलन पुनः सृष्टि का कल्याण करे।"

देवी ने तथास्तु कहा, परंतु एक शर्त रखी: "जब कभी मेरा अनादर होगा, मैं इस शरीर का त्याग कर दूँगी।"

4. सती के रूप में जन्म

यथासमय महारानी प्रसूति (दक्ष की पत्नी, स्वायम्भुव मनु की पुत्री) के गर्भ से आदिशक्ति ने पुत्री रूप में जन्म लिया। जन्म के समय आकाश में दुंदुभि बजी, पुष्पवर्षा हुई। बालिका का नाम सती रखा गया, जिसका अर्थ है - सत्य स्वरूपा, पतिव्रता।

शिवपुराण के अनुसार सती जन्म से ही शिवभक्त थीं। बाल्यावस्था में ही वे मिट्टी के शिवलिंग बनाकर पूजन करतीं, और युवावस्था में उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया, जिससे अंततः शिव-सती का विवाह हुआ।

यही आदिशक्ति का प्रथम मानवीय अवतार माना जाता है, जिसके बाद दक्ष यज्ञ में अपमान होने पर उन्होंने योगाग्नि से देह त्याग किया और पुनः पार्वती के रूप में हिमवान के घर अवतरित हुईं।

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