काशी उत्तर प्रदेश । सनातन धर्म में ऋषि मार्कण्डेय का नाम अमर ऋषियों में लिया जाता है। उनकी जीवनगाथा केवल एक ऋषि की कथा नहीं, बल्कि अटूट श्रद्धा, तपस्या और भगवान शिव की असीम कृपा का अद्भुत उदाहरण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऋषि मार्कण्डेय नैमिषारण्य की पवित्र तपोभूमि से काशी आए थे। इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए जाते हैं—मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की आराधना तथा सनातन ज्ञान की पराकाष्ठा और मोक्ष की साधना।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार ऋषि मार्कण्डेय का जन्म महर्षि मृकण्डु और उनकी पत्नी मरुद्वती के यहाँ हुआ था। भगवान शिव के वरदान से उन्हें अत्यंत तेजस्वी पुत्र तो प्राप्त हुआ, लेकिन उसकी आयु केवल 16 वर्ष निर्धारित थी। जब मार्कण्डेय किशोरावस्था में पहुँचे और उनके माता-पिता ने उन्हें उनके अल्पायु होने का सत्य बताया, तब उन्होंने भयभीत होने के बजाय भगवान शिव की शरण में जाने का संकल्प लिया।
सनातन परंपरा में काशी को भगवान शिव की अविमुक्त नगरी कहा गया है। मान्यता है कि यहाँ शिव स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें अकाल मृत्यु से मुक्ति प्रदान करते हैं। इसी विश्वास के साथ ऋषि मार्कण्डेय नैमिषारण्य से काशी पहुँचे। कहा जाता है कि काशी के उत्तरी क्षेत्र में, जहाँ गंगा और गोमती का संगम है और जिसे वर्तमान में मार्कण्डेय महादेव तीर्थ (कैथी) के नाम से जाना जाता है, उन्होंने एक शिवलिंग की स्थापना कर कठोर तपस्या आरंभ की।
जब उनकी आयु के अंतिम क्षण आए और यमराज उनके प्राण लेने पहुँचे, तब ऋषि मार्कण्डेय शिवलिंग से लिपटकर भगवान शिव का स्मरण करने लगे। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं शिवलिंग से प्रकट हुए और यमराज को रोक दिया। इसके बाद शिवजी ने मार्कण्डेय को चिरंजीवी होने का वरदान प्रदान किया। तभी से उन्हें अमर ऋषियों में स्थान प्राप्त हुआ और भगवान शिव के महामृत्युंजय स्वरूप की महिमा भी संसार में व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुई।
पौराणिक मान्यता यह भी है कि नैमिषारण्य वेदों, पुराणों और ऋषियों की महान तपोभूमि रही है। वहीं से प्रारंभिक वैदिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद ऋषि मार्कण्डेय ने शिव-भक्ति और मोक्ष की सर्वोच्च साधना के लिए काशी को चुना। उन्होंने भगवान शिव की आराधना करते हुए महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जप किया, जिसे आज भी अकाल मृत्यु, रोग और संकटों से रक्षा का दिव्य मंत्र माना जाता है।
ऋषि मार्कण्डेय की यह प्रेरणादायक कथा आज भी श्रद्धालुओं को यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति, अटूट विश्वास और तपस्या के बल पर असंभव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। काशी स्थित मार्कण्डेय महादेव तीर्थ आज भी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहाँ भक्त भगवान शिव की आराधना कर दीर्घायु, आरोग्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। सनातन परंपरा में यह कथा श्रद्धा, साहस और शिवकृपा का अनुपम प्रतीक मानी जाती है।

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