कोरिया, छत्तीसगढ़। भारत की प्राचीन शाक्त परंपरा में असम के नीलाचल पर्वत पर स्थित माँ कामाख्या का कामरूप महापीठ अत्यंत पवित्र, रहस्यमयी और सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह 51 शक्तिपीठों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। तांत्रिक परंपरा में इसे चार आदि शक्तिपीठों में अंतिम एवं सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि जब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के खंड हुए, तब उनका योनिभाग इसी स्थान पर गिरा था। इसी कारण कामाख्या पीठ को सृष्टि, शक्ति, सृजन और मातृशक्ति की मूल ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, साधक और तांत्रिक यहां दर्शन एवं साधना के लिए पहुंचते हैं।
शास्त्रों में मिलता है विस्तृत वर्णन
धार्मिक ग्रंथों में कामरूप महापीठ का अत्यंत विस्तार से वर्णन मिलता है। देवी भागवत, कालिका पुराण, अग्नि पुराण, योगिनी तंत्र, मंथान भैरव तंत्र, कुलदीपिका तंत्र तथा श्रीमतोत्तर तंत्र सहित अनेक ग्रंथों में इस महाशक्तिपीठ की महिमा का उल्लेख किया गया है। शास्त्रों के अनुसार माँ कामाख्या पहले कुब्जिका नाम से प्रसिद्ध थीं। विभिन्न ग्रंथों में इस पीठ को कामिकापीठ, महोच्छुष्म, प्राग्ज्योतिष पीठ और नील पर्वत जैसे नामों से भी संबोधित किया गया है।
रजस्वला स्वरूप की अनूठी परंपरा
माँ कामाख्या मंदिर की सबसे विशेष मान्यता यह है कि यहां देवी प्रत्येक वर्ष अंबुबाची काल में रजस्वला स्वरूप धारण करती हैं। इस अवधि में मंदिर के गर्भगृह के कपाट कुछ दिनों के लिए बंद रहते हैं और उसके बाद विशेष पूजा-अर्चना के साथ पुनः दर्शन प्रारंभ होते हैं। इसे नारी शक्ति, सृजन क्षमता और प्रकृति की उर्वरता का दिव्य प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला अंबुबाची महापर्व देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं, संतों और तांत्रिक साधकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
भगवान शिव ने दिया 'कामाख्या' नाम
कालिका पुराण के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं देवी को कामाख्या नाम प्रदान किया था। मान्यता है कि देवी शिव के साथ नीलाचल पर्वत पर विहार करने आई थीं, जिसके कारण उन्हें यह नाम प्राप्त हुआ। तांत्रिक परंपराओं में कामाख्या को इच्छा, शक्ति, सृजन और सिद्धि की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।
अद्भुत स्वरूप और तांत्रिक महिमा
तांत्रिक ग्रंथों में माँ कामाख्या के स्वरूप का विशेष वर्णन मिलता है। उनके छह मुख और बारह भुजाएँ बताए गए हैं, जो तंत्र के षडाम्नाय अर्थात छह प्रमुख आध्यात्मिक परंपराओं का प्रतीक माने जाते हैं। उनके विभिन्न मुखों में परा, मालिनी, सिद्धयोगेश्वरी, कालिका, त्रिपुरभैरवी और उमा के दिव्य स्वरूप समाहित माने गए हैं। बाराही तंत्र में देवी कुब्जिका को पश्चिमाम्नाय की अधिष्ठात्री बताया गया है तथा कामरूप महापीठ को पश्चिमाम्नाय का प्रमुख साधना केंद्र माना गया है।
आस्था, साधना और सिद्धि का केंद्र
धार्मिक मान्यता है कि माँ कामाख्या की श्रद्धापूर्वक उपासना करने से साधक की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा आध्यात्मिक उन्नति और साधना में विशेष सिद्धियों की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि सदियों से यह महापीठ शाक्त परंपरा, तंत्र साधना और सनातन संस्कृति का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बना हुआ है। यहाँ शक्ति और शिव के अद्वैत स्वरूप की उपासना आज भी उसी श्रद्धा और परंपरा के साथ की जाती है, जो हजारों वर्षों से चली आ रही है।
"जय शिवकामिनी माँ कामाख्या। जय कामप्रदा कामेश्वरी।"

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