नगर पालिका शिवपुर-चरचा में चुनावी सन्नाटा......, महिला आरक्षण ने बढ़ाई नेताओं की बेचैनी......... नेताओं की पत्नियों बनेगी प्रत्याशी या मिलेगा नया चेहरा......... दावेदारों की खामोशी बढ़ा रही राजनीतिक उत्सुकता....... अध्यक्ष पद महिला सामान्य वर्ग हेतु आरक्षित......., फिर भी मैदान में नहीं उतरा कोई बड़ा चेहरा.. ...


नीरज गुप्ता की विशेष रिपोर्ट 

 कोरिया चरचा कॉलरी.....कोरिया जिले के प्रमुख नगरीय निकाय नगर पालिका शिवपुर-चरचा में वर्ष 2026 के अंत में प्रस्तावित निकाय चुनाव को लेकर अभी तक अपेक्षित राजनीतिक हलचल दिखाई नहीं दे रही है। शासन द्वारा पूर्व में ही अध्यक्ष पद को सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित घोषित किए जाने के बावजूद भाजपा, कांग्रेस , निर्दलीय अथवा अन्य किसी राजनीतिक दल से अब तक किसी संभावित प्रत्याशी ने खुलकर दावेदारी प्रस्तुत नहीं की है। यह स्थिति इसलिए भी आश्चर्यजनक मानी जा रही है क्योंकि पूर्व के चुनावों में संभावित उम्मीदवार महीनों पहले से जनसंपर्क अभियान प्रारंभ कर देते थे।

कोरिया जिला कांग्रेस कमेटी ने नगर पालिका शिवपुर-चरचा चुनाव के लिए क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता योगेश शुक्ला को चुनाव संचालन की जिम्मेदारी सौंप दी है। दूसरी ओर भाजपा में जिला अध्यक्ष देवेंद्र तिवारी के नेतृत्व में बूथ स्तर तक संगठनात्मक गतिविधियां संचालित हो चुकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक दृष्टि से भाजपा वर्तमान में अधिक सक्रिय दिखाई देती है, जबकि कांग्रेस की सक्रियता अपेक्षाकृत बेहद सीमित नजर आ रही है।

दोनों दलों में गुटबाजी भी बनेगी चुनावी समीकरण का बड़ा आधार..........नगर पालिका शिवपुर-चरचा के आगामी चुनाव में केवल प्रत्याशी चयन ही नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के भीतर व्याप्त गुटबाजी भी निर्णायक भूमिका निभा सकती है। क्षेत्रीय राजनीति पर नजर रखने वाले लोगों का मानना है कि दोनों ही दलों में कई प्रभावशाली समूह सक्रिय हैं और यदि किसी एक गुट से जुड़े चेहरे को टिकट मिलता है तो दूसरा गुट प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उसे नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर सकता है।

कांग्रेस में लंबे समय से विभिन्न गुट सक्रिय रहे हैं। इसकी जानकारी जिला स्तर के पदाधिकारी को रही बावजूद उसके वे कभी भी कुदबाजी खत्म करने का प्रयास नहीं किया कांग्रेस के परंपरा रही है की जिले के पदाधिकारी सिर्फ चुनाव के समय ही कार्यकर्ताओं की पूंछ परख  करते हैं गुडबाजी खत्म करने के लिए सामने बैठकर हाथ मिला देते हैं किंतु दिल नहीं मिल पाते, ऐसे में टिकट वितरण के समय संगठन के सामने सभी पक्षों को संतुष्ट रखना बड़ी चुनौती होगी। यदि टिकट चयन में संतुलन नहीं साधा गया तो इसका सीधा प्रभाव चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है।वहीं भाजपा में भी अंदरूनी गुटबाजी किसी से छिपी नहीं है, हालांकि सत्ता में होने और संगठनात्मक अनुशासन के कारण अधिकांश मतभेद खुलकर सामने नहीं आ पाते। अध्यक्ष पद महिला सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित होने से भाजपा के कई नेताओं के समक्ष असहज राजनीतिक स्थिति निर्मित हो गई है एक ओर वे स्वयं पार्षद पद अथवा अन्य पदों के लिए टिकट चाहते हैं तो दूसरी ओर अपनी पत्नियों को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाए जाने के लिए भी प्रयासरत बताए जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि किसी एक परिवार को अध्यक्ष और पार्षद जैसे महत्वपूर्ण पदों पर एक साथ अवसर दिया जाता है तो पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ सकता है और उसका असर चुनावी परिणामों पर भी पड़ सकता है। स्थानीय मतदाता भी इस बार सामान्य वर्ग की महिला को अध्यक्ष बनना चाहते हैं उनका कहना है कि जब सभी वर्गों का आरक्षण होता है तो ऐसी स्थिति में सामान्य वर्ग को भी उसका हक मिलना चाहिए

इधर भाजपा मंडल अध्यक्ष दीपा विश्वकर्मा की बढ़ती सक्रियता भी राजनीतिक चर्चाओं का विषय बनी हुई है। क्षेत्र में यह चर्चा है कि वे भी अध्यक्ष पद की संभावित दावेदारों में शामिल हो सकती हैं। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन उनकी सक्रियता ने चुनावी समीकरणों को और रोचक बना दिया है।

क्या फिर दोहराई जाएगी ‘प्रॉक्सी राजनीति’.....

स्थानीय राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दोनों प्रमुख दलों के कुछ पदाधिकारियों की पत्नियों के नाम अध्यक्ष पद के लिए विचाराधीन हो सकते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश महिलाएं अब तक सक्रिय राजनीति अथवा जनसमस्याओं के निराकरण में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं रही हैं।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि केवल पारिवारिक राजनीतिक प्रभाव के आधार पर टिकट वितरण किया गया तो निर्वाचित होने के बाद भी वास्तविक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। नगर पालिका के इतिहास में पहले भी एक निर्वाचित योग्य मिलनसार महिला अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था, जिसका एक बड़ा कारण उनके कार्यों में उनके परिजन अत्यधिक बाहरी हस्तक्षेप माना गया था।

 अध्यक्ष पद हेतु लालमुनी यादव, रामकली यादव का नाम चर्चा में.......महिला नेतृत्व की बात करें तो कांग्रेस समर्थित पूर्व अध्यक्ष लालमुनी यादव लगातार क्षेत्रीय मुद्दों पर सक्रिय और मुखर दिखाई देती हैं। कांग्रेस में उनके अतिरिक्त अभी तक किसी अन्य महिला नेता ने अध्यक्ष पद के लिए प्रभावी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है।वहीं दूसरी ओर वार्ड क्रमांक 5 की पार्षद रामकली यादव का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में प्रमुखता से लिया जा रहा है। कई बार पार्षद रह चुकीं रामकली यादव ग्राम पंचायत, नगर पंचायत काल से लेकर वर्तमान नगर पालिका तक लगातार सक्रिय ब पार्षद रही हैं। वर्ष 2021 के चुनाव में भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी और अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की थी। बाद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान उन्होंने भाजपा का समर्थन किया, जिसके बाद अरुण जायसवाल कार्यकारी अध्यक्ष बने और वर्तमान में भी प्रभारी अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं और प्रदेश की राजनीति में भी उनकी अच्छी पकड़ है। यह भी चर्चा है कि अरुण जायसवाल अपनी धर्मपत्नी को अध्यक्ष पद का चुनाव लाडा सकते हैं किंतु अरुण जायसवाल ने इस बात का खंडन किया

चार माह शेष, लेकिन चुनावी रंग अब तक फीका.......यदि संभावित चुनाव कार्यक्रम के अनुसार अक्टूबर-नवंबर 2026 में आदर्श चुनावआचार संहिता लागू होती है तो राजनीतिक दलों के पास सक्रिय चुनावी तैयारी के लिए लगभग चार माह का समय ही शेष बचता है। इसके बावजूद नगर पालिका क्षेत्र में अभी तक वह चुनावी माहौल नहीं बन पाया है जिसकी सामान्यतः इस अवधि में अपेक्षा की जाती है।क्षेत्र की जनता भी चाहती है कि संभावित प्रत्याशी अभी से मैदान में उतरें, समस्याओं को समझें और उनके समाधान के लिए प्रयास करें। आम धारणा यह भी है कि चुनाव जीतने के बाद अधिकांश जनप्रतिनिधि जनता से दूर हो जाते हैं और मतदाताओं की याद केवल चुनाव के समय आती है।

भाजपा के लिए प्रतिष्ठा, कांग्रेस के लिए अवसर........कोरिया जिले की दो प्रमुख नगरपालिकाएं—शिवपुर-चरचा और बैकुंठपुर—एक साथ चुनावी मैदान में उतरेंगी। वर्तमान में दोनों निकायों पर भाजपा का नियंत्रण है। ऐसे में भाजपा के सामने अपनी सत्ता बरकरार रखने की चुनौती होगी, जबकि कांग्रेस के लिए सत्ता वापसी का अवसर रहेगा।

हाल ही में सूरजपुर जिले के शिवनंदनपुर निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने पूरी ताकत झोंकी थी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि शिवपुर-चरचा और बैकुंठपुर में भी इसी प्रकार का हाई-प्रोफाइल चुनावी मुकाबला देखने को मिल सकता है। क्योंकि प्रदेश में अन्य जगहों पर चुनाव नहीं है ऐसी स्थिति में दोनों ही दलों के प्रदेश स्तर के नेता,सतत रूढ़ दल के मंत्री चुनाव प्रचार में पहुंचकर अपने-अपनी पार्टी के लिए मतदाताओं को निभाएंगे

सबकी नजर भाजपा और कांग्रेस के अगले कदम पर.........राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर भाजपा अक्सर अप्रत्याशित राजनीतिक निर्णयों के लिए जानी जाती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा किसी नए और सक्रिय महिला चेहरे को आगे लाएगी या फिर किसी प्रभावशाली पदाधिकारी परिवार की महिला को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारेगी। वहीं कांग्रेस भी ऐसा चेहरा तलाश रही है जो संगठन और जनता दोनों के बीच स्वीकार्य हो।फिलहाल नगर पालिका शिवपुर-चरचा में चुनावी रणभेरी बजने का इंतजार है। दावेदारों की खामोशी, टिकट की जद्दोजहद, संभावित गुटबाजी और दलों की रणनीतिक चुप्पी ने राजनीतिक उत्सुकता को और बढ़ा दिया है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि चुनावी सन्नाटा कब और किसके नाम से टूटता है तथा जनता के बीच सबसे पहले कौन अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराता है।

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