नीरज गुप्ता की विशेष रिपोर्ट
कोरिया चरचा कॉलरी........ छत्तीसगढ़ में विकास के बड़े-बड़े दावे और ज़मीनी हकीकत के बीच का फर्क अगर कहीं देखना हो, तो नगर पालिका शिवपुर-चरचा का रुख कर लीजिए। यहां के निवासी कागजों में तो “शहरी” हो चुके हैं, लेकिन सुविधाएं आज भी “ग्रामीण” ही मिल रही हैं — वो भी अधूरी।वर्ष 1964 में स्थापित चिराग-सी चमकती चरचा कोलरी, जो कभी ग्राम पंचायत सरड़ी के अधीन थी, अब नगर पालिका शिवपुर का दर्जा पा चुकी है। 62 वर्षों की अवधि में 15 वार्डों में फैला यह क्षेत्र जनसंख्या और विकास दोनों में लंबा सफर तय कर चुका है। लेकिन लगता है कि इंडेन गैस कंपनी के सर्वर में समय आज भी 1980 के दशक में ही अटका हुआ है।
देश की सबसे बड़ी भूमिगत कोयला खदान चरचा कालरी में वर्ष 1986 में कर्मचारियों को सस्ती दर पर राशन और गैस उपलब्ध कराने के लिए कर्मचारी सहकारी उपभोक्ता भंडार की स्थापना की गई थी। उस दौर में यह व्यवस्था वरदान थी, लेकिन आज कर्मचारी सह कारी उपभोक्ता भंडार की स्थापना के 40 वर्ष बीत जाने के बावजूद वही “एकमात्र विकल्प” बनकर अभिशाप साबित हो रही है। ईरान इसराइल युद्ध के पूर्व चरचा कालरी में इंडेन रसोई गैस बहुत ही सहज सरल रूप में उपलब्ध था किसी भी उपभोक्ता को कोई परेशानी नहीं होती थी किंतु अब जब गैस की आपूर्ति कम कर दी गई तब लोगों को वास्तविकता नजर आई।
केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक शहरी उपभोक्ताओं को 26 दिन में गैस सिलेंडर मिलना चाहिए, जबकि ग्रामीणों के लिए 45 दिन का इंतजार तय है। लेकिन यहां तो कमाल ही हो गया — शहरी क्षेत्र नगर पालिका के लोग भी 45 दिन वाली “ग्रामीण परीक्षा” दे रहे हैं। एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि क्या ग्रामीण क्षेत्र के लोग कम गैस में ज्यादा खाना बना लेते हैं? इसलिए सरकार ने उन्हें गैस सिलेंडर आपूर्ति हेतु 45 दिन का समय निर्धारित कर दिया है और क्योंकि शहर वालों को ज्यादा भूख लगती है, इसलिए उन्हें जल्दी अर्थात 26 दिन में गैस मिलती है?अगर ऐसा है, तो फिर नगर पालिका शिवपुर-चरचा के लोग किस श्रेणी में आते हैं — “आधे शहरी, आधे ग्रामीण” या “पूरी तरह उपेक्षित”?
कर्मचारी उपभोक्ता भंडार के प्रबंधक के.राजू का सकहना है कि “इंडियन ऑयल के सर्वर में यह क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र के रूप में फीड है, इसलिए समस्या बनी हुई है। हम लोगों ने शहरी क्षेत्र में बदलने हेतु निवेदन किए थे किंतु अभी तक कार्यवाही नहीं हुई है”यानी विकास की गाड़ी सड़क पर दौड़ रही है, लेकिन सिस्टम की फाइलें अब भी बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही हैं।
ईंधन गैस की कमी व देरी का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ रहा है। सिलेंडर समय पर न मिलने से उन्हें मजबूरन कोयला और अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है। इस वजह से प्रदूषण भी फैलता है एक तरफ भीषण गर्मी, दूसरी तरफ धुएं का प्रकोप — यह “डबल इंजन” नहीं, बल्कि “डबल मुसीबत” है।
चर्चा क्षेत्र की समस्याओं के समाधान हेतु प्रतिबद्ध चर्चा बचाव मंच के पदाधिकारियों ने कहा कि अब यह “गैस का मामला” नहीं, बल्कि “सम्मान का सवाल” बन चुका है। जल्द ही शहरी हक के हिसाब से गैस आपूर्ति सुनिश्चित कराने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।
शिवपुर-चर्चा में विकास की कहानी कुछ यूं है —नगर पालिका का बोर्ड लगा है, लेकिन सुविधाएं अब भी गांव वाली ही मिल रही हैं!अब देखना यह है कि गैस कंपनी की नींद पहले टूटती है या फिर जनता का धैर्य…


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