कोरिया बैकुंठपुर। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में अंबिकापुर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पंडोनगर का ऐतिहासिक राष्ट्रपति भवन आज भी देश के जनजातीय इतिहास और आत्मगौरव की जीवंत मिसाल है। इस भवन का सीधा और गौरवपूर्ण संबंध भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से जुड़ा हुआ है, जो इसे राष्ट्रीय महत्व की धरोहर बनाता है।
22 नवंबर 1952 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरगुजा प्रवास पर पहुंचे थे। इस दौरान वे विशेष रूप से पंडो जनजाति से मिलने, उनकी सामाजिक स्थिति को समझने और बच्चों को शिक्षा का महत्व बताने आए थे। जनजातीय समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता और सरोकार उस समय देखने को मिला, जब उनके ठहरने के लिए पंडोनगर में इस भवन का निर्माण किया गया। यही भवन आगे चलकर “राष्ट्रपति भवन” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह भवन केवल एक विश्राम स्थल नहीं था, बल्कि उस दौर में आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा और विकास के प्रति जागरूक करने का प्रतीक बना। डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पंडो समुदाय के बीच आना उनके लिए सम्मान और आत्मविश्वास का विषय रहा, जिसकी स्मृति आज भी समाज में जीवित है।
वर्तमान समय में यह ऐतिहासिक राष्ट्रपति भवन साल में कुछ विशेष अवसरों पर ही खोला जाता है। पंडो समाज आज भी इसे अत्यंत गर्व, सम्मान और श्रद्धा के साथ संजोए हुए है। यह भवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि जनजातीय समाज का इतिहास भी राष्ट्र निर्माण की यात्रा का अहम हिस्सा रहा है।
पंडोनगर का यह राष्ट्रपति भवन केवल ईंट और पत्थरों से बनी इमारत नहीं, बल्कि जनजातीय सम्मान, आत्मगौरव, शिक्षा और विकास की उस जीवंत कहानी का प्रतीक है, जो आज भी पंडो समाज की पहचान और प्रेरणा बनी हुई है।

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