कोरिया बैकुंठपुर। जिले में प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर गंभीर और ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। एक ओर शासन और प्रशासन द्वारा जल संरक्षण, जल संवर्धन और जल बचाने को लेकर विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर जिले के कई पारंपरिक जल स्रोत आज प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर पहुंचते जा रहे हैं।
कोरिया जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में कभी ऐसे अनेक प्राकृतिक जल स्रोत हुआ करते थे, जिनसे हजारों ग्रामीण अपनी दैनिक जरूरतों के लिए पानी प्राप्त करते थे। इन स्रोतों का पानी न केवल पीने योग्य माना जाता था, बल्कि ग्रामीण समाज में इनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी था। लोग इन जल स्रोतों की पूजा करते थे और इन्हें प्रकृति का अमूल्य वरदान मानते थे।
समय के साथ बदलती परिस्थितियों, बढ़ती उपेक्षा और संरक्षण के अभाव में आज इन जल स्रोतों की स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। कई स्थानों पर प्राकृतिक कुएं, झरने और तालाब गंदगी, अतिक्रमण और सफाई के अभाव में अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। कुछ जल स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं, जबकि कई जगहों पर उनका अस्तित्व केवल नाम मात्र का रह गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जल संकट और भी गंभीर रूप ले सकता है। वर्तमान में जहां भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, वहीं पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला प्रशासन को ऐसे सभी प्राकृतिक जल स्रोतों का सर्वे और चिन्हांकन कर उनकी साफ-सफाई, गहरीकरण और संरक्षण की दिशा में विशेष अभियान चलाना चाहिए। साथ ही ग्रामीणों की सहभागिता से इन स्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
यदि जिला प्रशासन कोरिया इस दिशा में गंभीरता से कार्य करते हुए पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए ठोस योजना तैयार करता है, तो निश्चित तौर पर आने वाले सैकड़ों वर्षों तक जिले में जल संकट की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। प्राकृतिक जल स्रोत केवल पानी का माध्यम नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और पर्यावरणीय संतुलन के महत्वपूर्ण आधार भी हैं, जिन्हें बचाना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।

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