कोरिया बैकुंठपुर। कोरिया जिले में अवैध ईंट भट्ठों का कारोबार तेजी से फैलता जा रहा है। विशेष रूप से जिला मुख्यालय बैकुंठपुर तथा शिवपुर-चर्चा के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इन इलाकों के लगभग हर गांव में 8 से 10 अवैध भट्ठे संचालित हो रहे हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर कोयले का उपयोग किया जा रहा है।
इन भट्ठों के तेजी से फलने-फूलने का मुख्य कारण क्षेत्र में कोयले की आसान उपलब्धता है। बिना किसी वैध अनुमति के संचालित हो रहे ये भट्ठे पर्यावरण के साथ-साथ सरकारी राजस्व को भी भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। बावजूद इसके, संबंधित विभागों द्वारा अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
जिला मुख्यालय बैकुंठपुर के ग्राम पंचायत भंडारपारा चौक के पास संचालित एक अवैध भट्ठा विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि यह भट्ठा राजस्व विभाग की भूमि पर बना है या वन विभाग की जमीन पर। हालांकि, भट्ठे के समीप वन विभाग का एक संरचना (काम मुदारा) मौजूद है, जिससे यह संकेत मिलता है कि जमीन वन विभाग के अंतर्गत हो सकती है। इसके बावजूद, वन विभाग द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जाना संदेह को और गहरा करता है।
राजस्व और वन विभाग के बीच समन्वय की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है। दोनों विभाग यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि अवैध भट्ठों के खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है। नतीजतन, यह अवैध कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है और जिम्मेदार विभाग केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नजर आ रहे हैं।
इस पूरे मामले में खनिज विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्षेत्र में कोयले की अवैध सप्लाई जारी है, जो इन भट्ठों को संचालन में मदद कर रही है। यदि खनिज विभाग समय रहते सख्ती दिखाता, तो संभवतः इस अवैध कारोबार पर अंकुश लगाया जा सकता था। लेकिन वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि विभाग की निष्क्रियता ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।
भट्ठा संचालकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस पूरे अवैध कारोबार में कई स्तरों पर मिलीभगत है और “सबका हिस्सा बंधा हुआ है”, जिसके कारण कोई कार्रवाई नहीं होती। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर विफलता को दर्शाता है।
यदि समय रहते इन अवैध भट्ठों और कोयले की अवैध सप्लाई पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। पर्यावरण को नुकसान, राजस्व की हानि और कानून व्यवस्था पर प्रभाव जैसे कई गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं या फिर यह मामला भी कागजों में ही दबकर रह जाएगा।

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