कोरिया बैकुंठपुर। सत्ता के लालच में वर्ष 1975 में देश पर लगाए गए आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। उस दौर में नागरिकों के मूल अधिकार निलंबित कर दिए गए थे और हजारों लोकतंत्र रक्षकों को जेलों में डाल दिया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा शासन ने तानाशाही स्वरूप धारण कर लिया था। उस समय की केंद्र सरकार का नेतृत्व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कर रही थीं।
हालांकि लोकतंत्र में अटूट विश्वास रखने वाले साहसी प्रहरियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने संघर्ष, त्याग और बलिदान के बल पर तानाशाही का डटकर मुकाबला किया और अंततः देश में पुनः लोकतंत्र की स्थापना हुई। उनके इसी साहस और समर्पण को सम्मान देने के लिए भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र सेनानियों के लिए पेंशन योजना प्रारंभ की गई थी। किंतु पूर्ववर्ती भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस शासनकाल में इस पेंशन सेवा को बंद कर दिया गया था। वर्तमान सरकार ने इसे पुनः प्रारंभ कर लोकतंत्र सेनानियों को उनका सम्मान लौटाने का कार्य किया है।
इसी क्रम में कोरिया प्रवास के दौरान बैकुंठपुर निवासी 92 वर्षीय लोकतंत्र सेनानी डॉ. निर्मल घोष से उनके निवास पर सौजन्य भेंट करने का अवसर मिला। इस दौरान उन्होंने आपातकाल के संघर्षपूर्ण दिनों की अनेक स्मृतियाँ साझा कीं। जेल की यातनाओं, प्रतिबंधों और संघर्ष की कहानियाँ सुनकर मन भावुक हो उठा।
डॉ. घोष जैसे लोकतंत्र सेनानियों का त्याग और साहस आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका जीवन संदेश देता है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव सजग और समर्पित रहना आवश्यक है।

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