मातृ मृत्यु दर में कमी हेतु त्रिदिवसीय जिला स्तरीय प्रशिक्षण संपन्न यूनिसेफ और स्वास्थ्य विभाग का सराहनीय प्रयास


कोरिया बैकुंठपुर। जिला मुख्यालय बैकुंठपुर में मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार तथा जिले में मातृ मृत्यु अनुपात में प्रभावी कमी लाने के उद्देश्य से त्रिदिवसीय जिला स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम जिला पंचायत ऑडिटोरियम में सतत रूप से आयोजित किया जा रहा है। यह प्रशिक्षण जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग एवं यूनिसेफ के तकनीकी सहयोग से संचालित है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रशिक्षण मातृ मृत्यु को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कुंजी है, क्योंकि जिले में हो रही मातृ मृत्यु एक गंभीर एवं चिंताजनक विषय बनी हुई है।

कार्यक्रम का शुभारंभ कलेक्टर श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम कलेक्टर की अध्यक्षता में संचालित हो रहा है। इस अवसर पर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रशांत सिंह, सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक डॉ. आयुष जायसवाल, जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम) डॉ. अशरफ अंसारी, महिला एवं बाल विकास विभाग से जिला कार्यक्रम अधिकारी श्री रावटे, नीति आयोग से  इरशाद, प्रशिक्षण शाखा से राकेश सिंह, जिला  टीम से डिप्टी एमईआईओ सरोजनी राय,डीपीएच एन ओ मानकुंवर, स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की वार्ड प्रभारी श्रीमती सरस्वती पटेल, सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी, हितग्राही एवं प्रशिक्षणार्थी उपस्थित हैं।

प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को गुणवत्ता-पूर्वक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना, उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की समयबद्ध पहचान, सतत निगरानी तथा कम जन्म-वजन (Low Birth Weight) शिशुओं के स्वास्थ्य में सुधार सुनिश्चित करना है। प्रशिक्षण सत्रों में यह स्पष्ट किया गया कि मातृ मृत्यु अनुपात में कमी केवल संस्थागत सेवाओं से संभव नहीं है, बल्कि परिवार, समुदाय एवं विभिन्न विभागों की समन्वित भागीदारी से ही ठोस परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

यह त्रिदिवसीय प्रशिक्षण मैदानी स्तर से लेकर संस्थागत स्तर तक के स्वास्थ्य एवं पोषण कर्मियों के लिए चरणबद्ध रूप से आयोजित किया जा रहा है।

प्रथम दिवस में सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी, महिला एवं पुरुष सुपरवाइज़र तथा मितानिन डीसी शामिल रहे।

द्वितीय दिवस में जिला एवं ब्लॉक स्तरीय स्वास्थ्य टीम, आरएचओ (महिला-पुरुष), मितानिन बीसी एवं एमटी प्रशिक्षण में भाग ले रहे हैं।

तृतीय दिवस में पीएचसी प्रभारी, सीडीपीओ तथा महिला एवं बाल विकास विभाग के सुपरवाइज़र शामिल होंगे।

अब तक इस प्रशिक्षण के अंतर्गत कुल 169 प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जबकि शेष सत्र प्रगति पर हैं।

प्रशिक्षण के दौरान कंगारू मदर केयर (KMC) पहल का औपचारिक शुभारंभ भी किया गया। इस पहल के माध्यम से कम जन्म-वजन एवं समय से पूर्व जन्मे शिशुओं की देखभाल को सुदृढ़ करने, नवजात मृत्यु दर में कमी लाने तथा माँ-शिशु के बीच त्वचा-से-त्वचा संपर्क को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया जा रहा है। केएमसी को मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सुधार की एक प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इस प्रशिक्षण में डॉ. गजेन्द्र सिंह, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, यूनिसेफ छत्तीसगढ़ के नेतृत्व में यूनिसेफ टीम द्वारा तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है। प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से जिले के लिए एक स्पष्ट, केंद्रित एवं व्यवहारिक कार्ययोजना तैयार करने, माइक्रो-प्लानिंग को सुदृढ़ करने तथा जमीनी स्तर पर सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि जिले में मातृ मृत्यु अनुपात एक बड़ी चुनौती है, जिसे कम करने के लिए स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा नीति आयोग के बीच प्रभावी अभिसरण आवश्यक है। साथ ही, अन्य जिलों में पोषण आधारित सफल नवाचारों से मिले सकारात्मक अनुभवों को अपनाने पर भी चर्चा की जा रही है।

कलेक्टर महोदया द्वारा निर्देशित किया गया कि गांव स्तर पर ऐसी प्रभावशाली समितियों का गठन किया जाए, जिनकी बात समुदाय स्वीकार करता हो। उन्होंने एएनएम द्वारा गर्भवती महिलाओं की नियमित ट्रैकिंग, समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने तथा मातृ मृत्यु की समीक्षा को जिला स्तर के साथ-साथ गांव स्तर पर भी करने पर विशेष जोर दिया। साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हेतु वर्तमान में यूनिसेफ द्वारा तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ किया जा रहा है। कलेक्टर  ने अपेक्षा व्यक्त की कि भविष्य में भी मातृ-शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार के लिए यूनिसेफ का तकनीकी सहयोग इसी प्रकार निरंतर बना रहे, ताकि जिले में सतत एवं प्रभावी परिणाम सुनिश्चित किए जा सकें।

प्रशिक्षण के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य जांच गुणवत्ता-पूर्वक हो, एएनएम की ट्रैकिंग सटीक रहे तथा जोखिमों की समय रहते पहचान कर आवश्यक हस्तक्षेप सुनिश्चित किया जाए। कार्यक्रम के अंतर्गत महिलाओं के पोषण, नियमित जांच, प्रभावी काउंसलिंग एवं समुदाय-आधारित जागरूकता को मातृ-शिशु स्वास्थ्य सुधार की मजबूत नींव के रूप में स्थापित किया जा रहा है।

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