अंबिकापुर में जनजातीय गौरव दिवस कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति मुर्मु और बसन्त पण्डो की विशेष मुलाकात


कोरिया छत्तीसगढ़। अंबिकापुर में आयोजित जनजातीय गौरव दिवस कार्यक्रम इस वर्ष बेहद यादगार बन गया, जब पण्डो जनजाति से आने वाले बसन्त पण्डो की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से विशेष मुलाकात हुई। कार्यक्रम के दौरान सादगी और आत्मीयता से परिपूर्ण इस क्षण ने न केवल उपस्थित जनसमूह को भावुक किया, बल्कि decades पुराने उस ऐतिहासिक प्रसंग को भी पुनर्जीवित कर दिया, जिसने पण्डो जनजाति को ‘राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र’ कहलाने का गौरव दिलाया।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु जी ने बसन्त पण्डो से बड़ी आत्मीयता से बातचीत की और उनका स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम जाना। बातचीत के दौरान राष्ट्रपति मुर्मु ने बसन्त पण्डो को स्नेहपूर्वक शॉल भेंट की। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “आप मेरे भी पुत्र हैं”—यह वाक्य पूरे कार्यक्रम में उपस्थित जनजातीय समुदाय के लिए गर्व का क्षण बन गया। राष्ट्रपति की इस आत्मीयता ने यह स्पष्ट कर दिया कि आज भी जनजातीय समाज के इतिहास, परंपरा और सम्मान का स्थान राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति के हृदय में उतना ही महत्वपूर्ण है।

इस मुलाकात का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बसन्त पण्डो वही व्यक्ति हैं, जिन्हें वर्ष 1952 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने अंबिकापुर प्रवास के दौरान गोद में उठाया था। उस समय बसन्त पण्डो मात्र आठ वर्ष की आयु के थे और स्थानीय लोग उन्हें प्यार से ‘गोलू’ कहकर बुलाते थे। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने न केवल गोलू को गोद में उठाया, बल्कि उन्हें ‘बसन्त’ नाम भी स्वयं ही दिया। इस ऐतिहासिक क्षण को जनजातीय समाज आज भी गर्व और सम्मान के साथ याद करता है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद के इस स्नेहपूर्ण व्यवहार और पण्डो जनजाति के साथ स्थापित हुए अनूठे संबंध के कारण ही, पण्डो जनजाति को बाद के वर्षों में ‘राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र’ के रूप में संबोधित किया जाने लगा। यह परंपरा और गौरवजनक उपाधि आज भी इस जनजाति की सामाजिक पहचान और सम्मान का अभिन्न हिस्सा है।

जनजातीय गौरव दिवस पर आयोजित इस वर्ष का समारोह इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि इसमें अतीत और वर्तमान का अद्भुत संगम देखने को मिला। जनजातीय परंपराओं, संस्कृति और विरासत को सम्मान देने के साथ-साथ राष्ट्रपति मुर्मु और बसन्त पण्डो की मुलाकात ने इस कार्यक्रम को एक ऐतिहासिक रंग दे दिया। जब राष्ट्रपति ने बसन्त पण्डो को अपना पुत्र कहा, तो उस क्षण ने यह संदेश भी दिया कि देश की जनजातीय समुदायों के साथ भावनात्मक जुड़ाव केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी उतना ही जीवंत और प्रासंगिक है।

कार्यक्रम स्थल पर मौजूद जनजातीय प्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों ने इस दृश्य को गर्व के साथ देखा और माना कि यह मुलाकात आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। जनजातीय गौरव दिवस का यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक विरासत को सलाम करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि देश के आदिवासी समाज को सर्वोच्च स्तर पर सम्मान मिलता रहा है और आगे भी मिलता रहेगा।

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