दीपोत्सव की पावन बेला पर प्रकाश, प्रेम और मर्यादा का संदेश


कोरिया बैकुंठपुर । समूचा देश  दीपों के पर्व दीपावली की आभा में नहाया हुआ है। यह केवल प्रकाश का उत्सव नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, अधर्म पर धर्म और नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय का प्रतीक पर्व है। दीपावली का संबंध मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन से जुड़ा हुआ है। जब भगवान श्रीराम चौदह वर्षों के वनवास के पश्चात लंका विजय कर माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तब सम्पूर्ण नगर दीपों की ज्योति से आलोकित हो उठा था। अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय प्रभु का स्वागत दीप प्रज्वलित कर किया था। तभी से यह पर्व ‘दीपावली’ के रूप में मनाया जाता है।

दीपोत्सव हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन में अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, एक दीप की ज्योति उसे मिटा सकती है। उसी तरह मानव जीवन में यदि करुणा, स्नेह और मर्यादा का दीप प्रज्वलित रहे तो हर दिशा आलोकित हो उठती है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रेम और एकता का भी संदेश देता है। दीपावली के अवसर पर लोग अपने घरों, मंदिरों और कार्यस्थलों को दीपों से सजाते हैं, आतिशबाजी करते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं।

अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन इस वर्ष भी भव्य रूप में किया जा रहा है। राम की नगरी दीपों से जगमगा रही है। लाखों दीपों की श्रृंखला यह संदेश देती है कि जब हृदय में श्रद्धा और आस्था का प्रकाश जलता है, तब समूचा समाज प्रकाशित होता है। दीपावली केवल बाहरी सजावट का पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर बसे अंधकार को मिटाने का भी अवसर है।

इस दीपोत्सव पर यह संकल्प लें कि हम अपने भीतर करुणा, सह-अस्तित्व और स्नेह के दीप जलाएँ। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को जीवन में अपनाएँ — सत्य, सेवा और धर्म के पथ पर चलें। जिस प्रकार अयोध्या के दीपों ने राम के स्वागत में जगमगाहट फैलाई थी, उसी प्रकार हमारे कर्म, विचार और व्यवहार भी समाज में प्रकाश फैलाएँ।

दीपावली का यह पावन अवसर सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और प्रेम का उजाला लाए। प्रभु श्रीराम की कृपा से हर हृदय प्रकाशित हो, और हर मन में नई आशा का दीप प्रज्वलित हो। यही दीपोत्सव का सच्चा संदेश है।



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ