कोरिया बैकुंठपुर । छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी कही जाने वाली हसदेव नदी आज उपेक्षा का शिकार होती जा रही है। यह नदी न केवल प्रदेश की जल व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, बल्कि अनेकों जनजीवन और कृषि गतिविधियों का आधार भी है। किंतु विडंबना यह है कि इसके उद्गम स्थल की स्थिति आज भी बेहद दयनीय है। संरक्षण और संवर्धन के अभाव में यह ऐतिहासिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है।
हसदेव नदी का उद्गम कोरिया जिले के सोनहत क्षेत्र के समीप स्थित है। यह वही पवित्र स्थान है, जहां से निकलकर यह नदी छत्तीसगढ़ के कई जिलों से होकर बहती हुई महानदी में समाहित होती है। इस नदी का नाम ही हर्षदेव (हसदेव) से पड़ा है, जो प्राचीन काल से आस्था और समृद्धि का प्रतीक रही है।
उद्गम स्थल के आसपास कभी घने जंगल, निर्मल झरने और हरियाली का विस्तार हुआ करता था, लेकिन आज वहां की स्थिति चिंताजनक हो चुकी है। संरक्षण के अभाव, अवैध अतिक्रमण और प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी के कारण नदी की धारा और उसके आसपास का पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
गौरतलब है कि प्रदेश के वरिष्ठ नेता और छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत के प्रयासों से हर्षदेव उद्गम स्थल के पास हदेवेश्वर महादेव मंदिर का भव्य निर्माण कराया गया है। इस मंदिर में नियमित रूप से पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजन होते हैं, जिससे स्थानीय लोगों की आस्था इस स्थल से गहराई से जुड़ी है। किंतु धार्मिक दृष्टि से विकसित होने के बावजूद उद्गम स्थल का वास्तविक संरक्षण कार्य अब तक नहीं हो पाया है।
स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि हसदेव नदी के उद्गम स्थल को राजनीतिक दृष्टिकोण से परे रखकर एक पर्यावरणीय धरोहर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। यह न केवल धार्मिक बल्कि पर्यटन और पारिस्थितिकी दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
इस स्थल के संरक्षण के लिए वन विभाग, पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन को मिलकर एक ठोस योजना बनानी चाहिए। वृक्षारोपण, जलस्रोतों की सफाई, सीमांकन और पथ निर्माण जैसे कदम उठाकर इसे एक पर्यावरण पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
हसदेव नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा है। यदि इसके उद्गम स्थल की सुरक्षा पर अभी ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में यह धरोहर इतिहास बनकर रह जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि सरकार, समाज और पर्यावरण प्रेमी मिलकर हसदेव उद्गम स्थल को संरक्षित करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राकृतिक विरासत का गौरव महसूस कर सकें।


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