वसन्तपञ्चमी: ज्ञान, कला और वाणी की आराधना का पावन पर्व


कोरिया बैकुंठपुर। वसन्तपञ्चमी का पर्व भारतीय संस्कृति में ज्ञान, कला, संगीत और वाणी की देवी माँ सरस्वती की उपासना के रूप में विशेष स्थान रखता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व वसन्त ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है। प्रकृति में नवजीवन का संचार, पीले पुष्पों की बहार और उल्लासपूर्ण वातावरण इस दिन की विशेष पहचान है।

इस शुभ अवसर पर माँ सरस्वती की आराधना करते हुए विद्या, बुद्धि, विवेक और सृजनात्मकता की कामना की जाती है। शास्त्रों में वर्णित अगस्त्यमुनि-प्रोक्त सरस्वती स्तोत्रम् में वाणी की देवी से यह प्रार्थना की गई है—

“सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना।”

अर्थात्, वाणी की देवी प्रसन्न होकर सदा मेरे मुख (वाणी) में निवास करें। यह मंत्र विद्या के साथ-साथ शुद्ध, सत्य और मधुर वाणी की साधना का संदेश देता है।

वसन्तपञ्चमी के दिन विद्यालयों, महाविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है। विद्यार्थियों द्वारा पुस्तकों, वाद्ययंत्रों और लेखन सामग्री का पूजन कर अध्ययन की शुभ शुरुआत की जाती है। कई स्थानों पर इस दिन विद्यारम्भ संस्कार भी संपन्न होता है, जिससे बच्चों के जीवन में शिक्षा का औपचारिक प्रवेश होता है।

पीला रंग इस पर्व का प्रमुख प्रतीक माना जाता है, जो समृद्धि, ऊर्जा और ज्ञान का द्योतक है। श्रद्धालु पीले वस्त्र धारण करते हैं तथा केसरिया-पीले व्यंजनों का प्रसाद अर्पित किया जाता है। पतंगबाजी, संगीत-नृत्य और साहित्यिक गतिविधियाँ उत्सव में उल्लास भर देती हैं।

वसन्तपञ्चमी न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि यह समाज को ज्ञान, कला और सद्भाव की दिशा में प्रेरित करने वाला सांस्कृतिक उत्सव भी है। इस पावन दिन पर माँ सरस्वती की कृपा से जीवन में विवेक, सृजन और मधुर वाणी का वास हो—यही कामना की जाती है।

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